बच्चों में खाने से जुड़ी समस्या: क्या सिर्फ नखरा है या कोई गंभीर विकार?
हर माता-पिता की यह शिकायत होती है कि उनका बच्चा खाने में बहुत नखरे करता है। कोई सिर्फ चावल खाने पर अड़ा रहता है, तो कोई केवल जंक फूड ही पसंद करता है। अक्सर परिवार के लोग इसे बच्चे की जिद, बुरी आदत या बिगड़ैलपन समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन यह समस्या केवल नखरा नहीं, बल्कि एक गंभीर मानसिक और खानपान संबंधी विकार भी हो सकती है, जिसे एआरएफआईडी कहा जाता है।
क्या है एआरएफआईडी (Avoidant Restrictive Food Intake Disorder)?
एआरएफआईडी यानी अवॉइडेंट रेस्ट्रिक्टिव फूड इनटेक डिसऑर्डर, दुनियाभर में बच्चों में तेजी से देखी जाने वाली एक समस्या है। इस विकार से ग्रसित बच्चे किसी खास स्वाद, रंग, गंध, बनावट या पहले किसी बुरे अनुभव के कारण कई तरह के भोजन से दूर भागने लगते हैं। यह सिर्फ खाने का मन न करना नहीं है, बल्कि एक मानसिक स्थिति है जिसमें बच्चे को खाने से डर लगने लगता है या फिर वह भोजन में बेहद कम रुचि दिखाता है।
जब बच्चा ठीक से खाना नहीं खाता, तो उसके शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिल पाता। इसका सीधा असर उसकी लंबाई, वजन, मानसिक विकास, पढ़ाई, सामाजिक व्यवहार और समग्र मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। समय रहते इस बीमारी की पहचान न होने पर शरीर में आयरन, विटामिन, प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों की गंभीर कमी हो सकती है। कुछ मामलों में बच्चों को सप्लीमेंट या ट्यूब फीडिंग तक की जरूरत पड़ सकती है।
किन बच्चों को होता है यह विकार?
मेडिकल रिपोर्ट्स बताती हैं कि एआरएफआईडी किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन बच्चे इसका सबसे ज्यादा शिकार होते हैं। इस विकार के कारण बच्चों में खाने को लेकर डर, संवेदनशीलता या अरुचि पैदा हो जाती है। कई बार माता-पिता लंबे समय तक यह समझ ही नहीं पाते कि उनके बच्चे की यह समस्या सामान्य नखरे से कहीं आगे की बात है।
अध्ययनों से पता चलता है कि एआरएफआईडी से पीड़ित बच्चों में अक्सर एंग्जाइटी, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर और अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (एडीएचडी) जैसी स्थितियां भी पाई जाती हैं। यानी यह विकार अकेला नहीं आता, बल्कि अन्य मानसिक समस्याओं के साथ जुड़ा हो सकता है।
एआरएफआईडी का इलाज: नई रिसर्च में बड़ी सफलता
हाल ही में ‘जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री’ में प्रकाशित एक अध्ययन ने एआरएफआईडी के इलाज को लेकर नई उम्मीद जगाई है। यह पहली बार है जब इस खानपान विकार के उपचार का मूल्यांकन रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल (सबसे वैज्ञानिक शोध पद्धति) के जरिए किया गया।
स्टैनफोर्ड मेडिसिन के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में यह अध्ययन 6 से 12 वर्ष की आयु के 98 बच्चों पर किया गया। शोधकर्ताओं ने दो अलग-अलग थेरेपी तरीकों का परीक्षण किया, जो दोनों ही ऑनलाइन दिए गए। हर बच्चे को चार महीने तक 14-14 सत्र प्रदान किए गए।
दो थेरेपी तरीके: कौन सा अधिक कारगर?
पहला तरीका: फैमिली-बेस्ड थेरेपी
इस थेरेपी में माता-पिता को सबसे अहम भूमिका निभानी होती है। उन्हें सिखाया जाता है कि कैसे वे अपने बच्चे की खाने की आदतों को धीरे-धीरे बदल सकते हैं। पूरा परिवार (माता-पिता, भाई-बहन और थेरेपिस्ट) एक साथ सत्रों में भाग लेता है। इस दौरान यह समझाया जाता है कि बच्चा जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा, बल्कि यह एक चिकित्सीय स्थिति है जिसके लिए परिवार के सहयोग की जरूरत है।
दूसरा तरीका: इंडिविजुअल मोटिवेशनल थेरेपी
इस थेरेपी में बच्चे को खुद प्रेरित किया जाता है। बच्चों के साथ गेम्स, एक्टिविटी और कल्पना आधारित अभ्यास कराए जाते हैं। जैसे कि काल्पनिक रेस्टोरेंट बनाना या अलग-अलग देशों के खाने के बारे में सोचना, ताकि उनमें खाने के प्रति रुचि जागे।
अध्ययन के नतीजे: दोनों थेरेपी कारगर
इस शोध के नतीजे बेहद उत्साहजनक रहे। जिन बच्चों ने फैमिली-बेस्ड थेरेपी ली, उनका वजन ज्यादा तेजी से बढ़ा और उनकी सेहत में स्पष्ट सुधार देखा गया। वहीं दोनों ही समूहों में एआरएफआईडी के लक्षणों में कमी आई। यानी दोनों थेरेपी तरीके अपने-अपने स्तर पर प्रभावी साबित हुए।
अध्ययन में शामिल एक बच्ची ने बताया कि पहले वह बहुत सीमित चीजें ही खाती थी, लेकिन थेरेपी के बाद उसने धीरे-धीरे नए खाद्य पदार्थ आजमाने शुरू किए। पहले जिन चीजों से वह परहेज करती थी, जैसे अंडा, एवोकाडो, दही और फल, अब वह उन्हें पसंद करने लगी है।
विशेषज्ञों की राय: पहचान है जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, एआरएफआईडी सिर्फ चुन-चुनकर खाना खाने की आदत नहीं है, बल्कि यह एक वास्तविक मानसिक और शारीरिक समस्या है। अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो बच्चों में पोषण की कमी, कमजोरी और विकास से जुड़ी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।
कई बार बच्चे किसी डर या बुरे अनुभव के कारण खाना छोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी बच्चे का पहले कभी गला अटक गया हो, तो वह उस खास तरह के भोजन से डरने लगता है। ऐसे में केवल डांट-फटकार से समस्या हल नहीं होती, बल्कि पेशेवर मदद की जरूरत होती है।
अच्छी खबर यह है कि एआरएफआईडी का इलाज संभव है। सही थेरेपी, डॉक्टर की सलाह और परिवार के सहयोग से बच्चों की खाने की आदतों में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। अगर आपका बच्चा भी खाने में बहुत अधिक नखरे करता है और उसका वजन या विकास प्रभावित हो रहा है, तो इसे सामान्य न समझें और किसी विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।