विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस 2026: क्या मोबाइल फोन से सच में होता है ब्रेन ट्यूमर? जानिए सच्चाई

हर साल 8 जून को विश्व ब्रेन ट्यूमर दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को ब्रेन ट्यूमर के प्रति जागरूक करना, इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों की पहचान करने में मदद देना और पीड़ितों को सहारा प्रदान करना है। ब्रेन ट्यूमर एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो हर साल लाखों लोगों की जान ले लेती है। जब भी ट्यूमर का नाम सुनाई देता है, सबसे पहले कैंसर का ख्याल दिमाग में आता है। खासकर जब यह मस्तिष्क में हो, तो चिंता और बढ़ जाती है, क्योंकि मस्तिष्क पूरे शरीर का नियंत्रण केंद्र है। इसलिए इससे जुड़ी कोई भी समस्या पूरे स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

ब्रेन ट्यूमर के लिए खराब जीवनशैली और बढ़ते पर्यावरणीय कारकों को जिम्मेदार माना जाता है। इसी से जुड़ा एक सवाल लोगों के मन में हमेशा रहता है कि क्या मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से ब्रेन ट्यूमर हो सकता है? क्या मोबाइल से निकलने वाला रेडिएशन मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है? आइए, इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।

ब्रेन ट्यूमर का बढ़ता खतरा

ब्रेन ट्यूमर के प्रति जागरूकता बढ़ाने और समय पर निदान के महत्व को समझाने के लिए हर साल 8 जून को यह दिवस मनाया जाता है। हम अक्सर फोन को कान से लगाकर बातें करते हैं, जिससे यह चिंता होना स्वाभाविक है कि कहीं इससे ट्यूमर का खतरा तो नहीं बढ़ता। यह सवाल लंबे समय से बहस का विषय रहा है। हालांकि, इस विषय पर किए गए कई अध्ययनों से पता चला है कि मोबाइल फोन से ब्रेन ट्यूमर होने की बात महज एक अफवाह है, जिसमें कोई वैज्ञानिक सच्चाई नहीं है।

क्या मोबाइल फोन के इस्तेमाल से होता है ब्रेन ट्यूमर?

इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर ने स्पष्ट किया है कि मोबाइल फोन के उपयोग और ब्रेन ट्यूमर या कैंसर के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए 2.50 लाख से अधिक मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं के डेटा का विश्लेषण किया गया।

  • इनमें से कई प्रतिभागियों ने अध्ययन में शामिल होने से पहले 15 साल या उससे अधिक समय तक नियमित रूप से मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया था।
  • ऐसे लोगों में ब्रेन ट्यूमर (जैसे ग्लियोमा और मेनिंगियोमा) के मामलों का पता लगाने के लिए औसतन 7 साल से अधिक समय तक निगरानी रखी गई।
  • जिन लोगों ने अपने जीवन में सबसे अधिक घंटे मोबाइल फोन पर बात की थी, उनमें ब्रेन ट्यूमर होने की दर उन लोगों से अलग नहीं थी, जिन्होंने फोन का बहुत कम इस्तेमाल किया था।

इन परिणामों से साफ है कि मोबाइल फोन के उपयोग से ट्यूमर होने का खतरा नहीं बढ़ता है।

क्या मोबाइल फोन से कैंसर होता है?

कैंसर रिसर्च यूके के वैज्ञानिकों ने भी एक रिपोर्ट में बताया कि मोबाइल फोन हो या वाई-फाई, इनमें से किसी से भी कैंसर नहीं होता। इन उपकरणों से निकलने वाला रेडिएशन इतना कमजोर होता है कि वह डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचा सकता। मोबाइल फोन और फोन टावरों के रेडिएशन में डीएनए को क्षतिग्रस्त कर कैंसर पैदा करने के लिए आवश्यक ऊर्जा नहीं होती। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि मोबाइल फोन और ब्रेन ट्यूमर के बीच कोई निश्चित संबंध स्थापित नहीं हुआ है, हालांकि इस विषय पर शोध जारी हैं।

कौन सी चीजें बढ़ा रही हैं खतरा?

शोध में अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कौन सी आदतें सीधे तौर पर ब्रेन ट्यूमर का कारण बनती हैं। फिर भी, कुछ जीवनशैली कारकों को खतरा बढ़ाने वाला माना जाता है:

  • धूम्रपान शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और कोशिकीय क्षति को बढ़ाता है, जो कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है।
  • अत्यधिक शराब का सेवन भी कई प्रकार के कैंसर के खतरे को बढ़ाने में सहायक होता है।
  • मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता शरीर में सूजन बढ़ा सकते हैं। कुछ अध्ययनों में मोटापे और कुछ प्रकार के मस्तिष्क ट्यूमर के बीच संभावित संबंध देखे गए हैं।
  • खराब नींद, अत्यधिक तनाव और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन का सेवन सीधे ब्रेन ट्यूमर का कारण नहीं माना जाता, लेकिन ये मस्तिष्क के स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और धूम्रपान से दूरी बनाए रखना समग्र स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी है। ये आदतें न केवल ब्रेन ट्यूमर बल्कि अन्य बीमारियों के खतरे को भी कम करने में मदद करती हैं।