एआई बुलबुला: क्या यह डॉट-कॉम संकट की तरह फूट सकता है?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को इस सदी की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति का दर्जा दिया जा रहा है। हर नई कंपनी अपने नाम के साथ ‘AI’ जोड़कर इस दौड़ में शामिल होना चाहती है। ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों का मूल्यांकन तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे की सच्चाई अलग नजर आती है। गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी दिग्गज कंपनियों ने अब तक एक लाख से अधिक कर्मचारियों की छंटनी की है। वहीं, एआई पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है। माइक्रोसॉफ्ट ने बढ़ती लागत के कारण क्लॉड की सदस्यता सेवा बंद कर दी। एक कंपनी ने दावा किया कि एआई के कारण उसका सालाना बजट सिर्फ चार महीनों में खत्म हो गया।

कई तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि एआई के साथ वही होने वाला है जो 1990 के दशक में डॉट-कॉम कंपनियों के साथ हुआ था। यानी एक बुलबुला बनेगा और फिर फूटेगा। आइए समझते हैं कि इन दोनों दौर की तुलना क्यों की जा रही है और अगर एआई का यह बुलबुला फूटता है तो दुनिया पर इसके क्या परिणाम होंगे।

डॉट-कॉम बुलबुला क्या था?

अर्थशास्त्र में ‘बुलबुला’ उस स्थिति को कहते हैं जब किसी संपत्ति या शेयर की कीमत उसके वास्तविक मूल्य से कई गुना अधिक बढ़ जाती है। डॉट-कॉम बुलबुला 1995 से 2000 के बीच का वह दौर था जब इंटरनेट आधारित कंपनियों के शेयरों में अवास्तविक वृद्धि हुई थी। इसे इंटरनेट बुलबुला या टेक बुलबुला भी कहा जाता है। उस समय हर वह कंपनी जिसका इंटरनेट से संबंध था, शेयर बाजार में रातोंरात अरबों की बन रही थी, भले ही उसका कोई ठोस व्यवसाय मॉडल या मुनाफा कमाने का साधन न हो।

डॉट-कॉम बुलबुले की शुरुआत कैसे हुई?

  • इंटरनेट का नया दौर: 90 के दशक में वर्ल्ड वाइड वेब आम लोगों की पहुंच में आने लगा था। निवेशकों को लगा कि इंटरनेट ही भविष्य है और ऑनलाइन आने वाली हर कंपनी भारी मुनाफा कमाएगी।
  • सस्ते कर्ज और वेंचर कैपिटल: उस समय ब्याज दरें कम थीं और बाजार में पूंजी की कोई कमी नहीं थी। वेंचर कैपिटलिस्ट बिना यह देखे कि कंपनी कैसे काम करेगी, इंटरनेट स्टार्टअप्स में अंधाधुंध पैसा लगा रहे थे।
  • ग्रोथ ओवर प्रॉफिट की नीति: कंपनियों का मुख्य ध्यान मुनाफा कमाने के बजाय जल्द से जल्द ग्राहक आधार बढ़ाने पर था। वे मार्केटिंग और विज्ञापन पर पानी की तरह पैसा बहा रही थीं।
  • बिना मुनाफे वाली कंपनियों के आईपीओ: कई घाटे में चल रही कंपनियां अपना आईपीओ लेकर आईं और शेयर बाजार में लिस्ट होते ही उनके शेयर आसमान छूने लगे। नैस्डैक इंडेक्स 1995 से 2000 के बीच 400 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया था।

बाजार पर प्रभाव और परिणाम

डॉट-कॉम बुलबुले के फटने का असर सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी दुनिया के शेयर बाजारों पर पड़ा। अक्टूबर 2002 तक नैस्डैक इंडेक्स अपने उच्चतम स्तर से लगभग 78 प्रतिशत गिर चुका था। इस गिरावट में निवेशकों के करीब 5 ट्रिलियन डॉलर डूब गए। Pets.com, Webvan, eToys और Kozmo.com जैसी कई चर्चित कंपनियां रातोंरात दिवालिया होकर बंद हो गईं। सिस्को, अमेजन और क्वालकॉम जैसी मजबूत कंपनियों के शेयरों में भी 80 से 90 प्रतिशत तक की गिरावट आई। हालांकि, इनके मजबूत व्यवसाय मॉडल के कारण ये कंपनियां इस झटके से उबरने में सफल रहीं। अमेजन का शेयर जो 100 डॉलर से ऊपर था, वह गिरकर 6 डॉलर से भी नीचे आ गया था।

भारत पर डॉट-कॉम संकट का प्रभाव पश्चिमी देशों की तुलना में सीमित था। इसका मुख्य कारण यह था कि भारतीय शेयर बाजार उस समय टेक कंपनियों के शेयरों में बहुत अधिक निवेशित नहीं था। वैश्विक अनिश्चितता के चलते भारतीय बाजार को भी नुकसान उठाना पड़ा और कई निवेशकों के पैसे डूब गए, लेकिन यह संकट इतना व्यापक नहीं था कि भारत में गंभीर आर्थिक मंदी आ सके।

एआई और डॉट-कॉम बुलबुले की तुलना क्यों हो रही है?

हर तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की चर्चा है। तकनीकी जगत से लेकर शेयर बाजार तक, हर जगह एआई का बोलबाला है। इस अभूतपूर्व तेजी ने कई आर्थिक विश्लेषकों को 1990 के दशक के डॉट-कॉम बुलबुले की याद दिला दी है। आइए समझते हैं कि आज की एआई क्रांति की तुलना डॉट-कॉम बुलबुले से क्यों की जा रही है।

अवास्तविक मूल्यांकन और अंधाधुंध निवेश

डॉट-कॉम दौर की तरह ही आज वेंचर कैपिटलिस्ट और आम निवेशक एआई स्टार्टअप्स में बिना किसी ठोस राजस्व या मुनाफे के मॉडल के अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। कई नई एआई कंपनियों का मूल्यांकन उनकी वास्तविक कमाई से कई सौ गुना अधिक आंका जा रहा है। निवेशकों में यह डर हावी है कि अगर उन्होंने अभी पैसा नहीं लगाया, तो वे भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति से चूक जाएंगे।

नाम के साथ ‘AI’ जोड़ने की होड़

1990 के दशक के अंत में, कई कंपनियां सिर्फ अपने नाम के आगे ‘.com’ लगाकर रातोंरात अपने शेयरों की कीमत बढ़ा लेती थीं। आज बिल्कुल वैसा ही चलन एआई के साथ देखा जा रहा है। कई कंपनियां, जिनका मुख्य व्यवसाय एआई से बहुत कम जुड़ा है, वे भी अपने हर उत्पाद और प्रस्तुति में ‘AI’ शब्द का इस्तेमाल कर रही हैं ताकि निवेशकों का ध्यान खींचा जा सके।

बुनियादी ढांचे पर भारी खर्च

डॉट-कॉम युग के दौरान फाइबर-ऑप्टिक केबल और दूरसंचार बुनियादी ढांचे पर आंख मूंदकर भारी खर्च किया गया था। आज वही स्थिति एआई के लिए जरूरी हार्डवेयर के साथ है। एनवीडिया जैसे चिप निर्माताओं के ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स और विशाल डेटा सेंटर्स को तैयार करने पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। चिंता की बात यह है कि उपभोक्ता अनुप्रयोगों से होने वाली वास्तविक कमाई अभी भी इस भारी बुनियादी ढांचे के खर्च की तुलना में काफी कम है।

अगर एआई का बुलबुला फूटा तो दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

शेयर बाजारों में भारी गिरावट

अगर निवेशकों को यह लगने लगा कि एआई से होने वाला वास्तविक मुनाफा उनके निवेश की तुलना में बहुत कम है, तो बाजार में निराशा और घबराहट फैल सकती है। इसके परिणामस्वरूप टेक कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली का दौर शुरू होगा। दुनिया भर के प्रमुख शेयर बाजारों में बड़ी गिरावट आ सकती है, जिससे छोटे और बड़े दोनों तरह के निवेशकों के ट्रिलियनों डॉलर डूब सकते हैं।

स्टार्टअप्स का दिवालिया होना और रोजगार संकट

जिन एआई स्टार्टअप्स के पास कोई स्थायी व्यवसाय मॉडल नहीं है और जो केवल निवेशकों के पैसे पर चल रहे हैं, उनका फंड रातोंरात सूख जाएगा। डॉट-कॉम संकट की तरह ही हजारों नई टेक कंपनियां दिवालिया होकर बंद हो सकती हैं। इसका सीधा असर वैश्विक रोजगार पर पड़ेगा। पूरे टेक सेक्टर में बड़े पैमाने पर छंटनी देखने को मिल सकती है, जिससे दुनिया भर में अस्थिरता पैदा होगी।

बड़ी कंपनियों का एकाधिकार

बुलबुला फूटने की स्थिति में केवल वही दिग्गज टेक कंपनियां बच पाएंगी जिनकी बुनियाद मजबूत है और जिनके पास एआई के विकास को जारी रखने के लिए पर्याप्त नकद भंडार मौजूद है। ये बड़ी कंपनियां घाटे में चल रहे छोटे लेकिन नवोन्मेषी स्टार्टअप्स को कौड़ियों के दाम पर खरीद लेंगी, जिससे बाजार में उनका एकाधिकार और अधिक मजबूत हो जाएगा।

बुलबुला फटने पर ही होगा उपयोगी एआई का उदय

हर आर्थिक बुलबुले के फटने का एक सकारात्मक पहलू भी होता है। डॉट-कॉम संकट के बाद ही अमेजन जैसी कंपनियों ने खुद को साबित किया और वेब 2.0 की मजबूत नींव रखी। इसी तरह, एआई बुलबुला फटने के बाद बाजार से हाइप की गई फर्जी कंपनियां साफ हो जाएंगी। इसके बाद जो एआई तकनीक और कंपनियां बचेंगी, वे अधिक परिपक्व, टिकाऊ और वास्तविक दुनिया की समस्याओं को सुलझाने पर केंद्रित होंगी।