भारत में आईवीएफ का सफर: पहली टेस्ट ट्यूब बेबी और उसके जनक की कहानी
दुनिया भर में लाखों दंपति संतान न होने की समस्या से जूझ रहे हैं। ऐसे में इन विट्रो फर्टिलाइजेशन यानी आईवीएफ तकनीक उनके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह प्रक्रिया मेडिकल साइंस की एक बड़ी क्रांति है, जिसने असंभव लगने वाले सपनों को साकार किया है। इस तकनीक के पीछे वैज्ञानिकों की दशकों की मेहनत, असफल प्रयोग और अथक संघर्ष छिपा है।
दुनिया का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी
25 जुलाई 1978 को ब्रिटेन में डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स और डॉ. पैट्रिक स्टेप्टो के प्रयासों से दुनिया की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन का जन्म हुआ। इस ऐतिहासिक घटना ने प्रजनन चिकित्सा के क्षेत्र में एक नया अध्याय जोड़ दिया। यह साबित हो गया कि विज्ञान के सामने कुछ भी असंभव नहीं है। इस सफलता ने दुनियाभर में निःसंतान दंपतियों के लिए उम्मीद की एक नई किरण जगाई।
भारत में पहली टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म
लुईस ब्राउन के जन्म के मात्र 67 दिन बाद, भारत ने भी एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। कोलकाता में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनकी टीम ने आईवीएफ तकनीक से भारत की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट ट्यूब बेबी के जन्म की घोषणा की। इस बच्ची का नाम कनुप्रिया अग्रवाल रखा गया, जिसे ‘दुर्गा’ के नाम से भी जाना जाता है। यह उपलब्धि उस समय और भी खास थी जब भारत में संसाधन सीमित थे।
डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय: भारत के आईवीएफ जनक
डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय को भारत में आईवीएफ तकनीक का जनक माना जाता है। उन्होंने उस दौर में यह कारनामा कर दिखाया जब तकनीकी संसाधन बहुत सीमित थे। उनका योगदान केवल पहली टेस्ट ट्यूब बेबी तक सीमित नहीं था। उन्होंने कई ऐसी तकनीकों पर काम किया जो बाद में दुनियाभर में मानक उपचार का हिस्सा बनीं।
- उन्होंने अंडाशय को उत्तेजित करने के लिए गोनाडोट्रोपिन आधारित तकनीकों का उपयोग किया, जो आज आम प्रक्रिया है।
- भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन यानी भ्रूण को फ्रीज करके सुरक्षित रखने के प्रयोग में भी वे अग्रणी थे।
- उन्होंने 1970 के दशक में ही कई ऐसे प्रयोग कर लिए थे जो आज आईवीएफ उद्योग का आधार हैं।
संघर्ष और उपेक्षा की कहानी
डॉ. मुखोपाध्याय की राह आसान नहीं थी। उन्होंने अपने शोध और निष्कर्षों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की, लेकिन उस समय की समिति ने उनके दावों को अविश्वसनीय और फर्जी बताकर खारिज कर दिया। इस उपेक्षा और लगातार अपमान ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया। उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उन्हें दिल का दौरा पड़ा।
आखिरकार 18 जून 1981 को उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने अंतिम नोट में उन्होंने लिखा, “मैं हर दिन दिल का दौरा पड़ने से मरने का इंतजार नहीं कर सकता।” यह उनके गहरे दर्द और निराशा को दर्शाता है।
मान्यता और सम्मान
डॉ. मुखोपाध्याय के योगदान को उनके जीवनकाल में वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। हालांकि, उनकी मृत्यु के बाद उनके काम को सराहा गया।
- 2002 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने आधिकारिक रूप से उनके योगदान को मान्यता दी।
- 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित डिक्शनरी ऑफ मेडिकल बायोग्राफी में स्थान मिला।
- 2012 में आईसीएमआर ने उनके नाम पर पुरस्कार की घोषणा की।
- 2020 में आईसीएमआर-राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने उनके जीवन पर एक विशेष पुस्तक प्रकाशित की।
- उनके नाम पर कई स्मृति व्याख्यान, अनुसंधान केंद्र और पुरस्कार स्थापित किए गए।
- उनके जीवन पर ‘एक डॉक्टर की मौत’ नाम से 1990 में एक फिल्म भी बनी।
आज आईवीएफ तकनीक लाखों दंपतियों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम बन चुकी है। खराब जीवनशैली, देर से शादी और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के कारण प्रजनन स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ा है। ऐसे में डॉ. मुखोपाध्याय जैसे वैज्ञानिकों का योगदान हमेशा याद किया जाएगा, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद भारत को इस क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाई।