वट पूर्णिमा 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और पूजा विधि
हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष महत्व है। यह व्रत सुहागिन महिलाओं द्वारा अपने अखंड सौभाग्य और दांपत्य जीवन की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। वट पूर्णिमा के दिन सावित्री और सत्यवान की पवित्र कथा सुनने का विशेष विधान है।
वट पूर्णिमा व्रत तिथि 2026
हिंदू पंचांग के अनुसार, वट पूर्णिमा का व्रत ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत सोमवार, 29 जून को रखा जाएगा। इस दिन सुहागिन महिलाएं वट (बरगद) वृक्ष की विधिवत पूजा और परिक्रमा करती हैं।
पूर्णिमा तिथि 29 जून को सुबह 03 बजकर 06 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 30 जून को सुबह 05 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर ज्येष्ठ पूर्णिमा 29 जून को ही मनाई जाएगी।
पूजा का शुभ मुहूर्त और योग
वट पूर्णिमा के दिन पूजा और स्नान के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 06 मिनट से 04 बजकर 46 मिनट तक रहेगा। इस दिन अभिजीत मुहूर्त में पूजा करना विशेष शुभ माना गया है।
इस वर्ष वट पूर्णिमा पर दो शुभ योग बन रहे हैं। पहला शुभ योग सुबह से शुरू होकर दोपहर 2 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। इसके बाद दूसरा शुभ योग (ब्रह्म योग) शुरू हो जाएगा। इन शुभ योगों में की गई पूजा अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
वट पूर्णिमा व्रत का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में वट पूर्णिमा व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस दिन वट वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करने से दांपत्य जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। सुहागिन महिलाएं इस दिन वट वृक्ष की सात परिक्रमा करती हैं, सूत (कलावा) बांधती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो महिलाएं पूर्ण विधि-विधान से वट पूर्णिमा का व्रत करती हैं, उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है। यह व्रत पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास को मजबूत करता है।
वट वृक्ष पूजा के लाभ
हिंदू धर्म में वट वृक्ष की पूजा के लिए विशेष विधान बताए गए हैं। स्कंद पुराण के अनुसार, विशेष तिथियों पर वट वृक्ष की पूजा करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- दांपत्य जीवन में सुख और शांति आती है।
- अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
- जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं।
- वट वृक्ष का रोपण करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
- वृक्ष की परिक्रमा और कलावा बांधने से पति की लंबी आयु और संतान सुख प्राप्त होता है।
व्रत का पालन क्षेत्रानुसार
यह व्रत उत्तर भारत की तुलना में महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित है। उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को अधिक मनाया जाता है। दोनों ही तिथियों पर सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष की पूजा कर अपने पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
वट पूर्णिमा का यह पवित्र पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत श्रद्धा और आस्था का दिन होता है, जिसमें वे अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए वट वृक्ष की आराधना करती हैं।