यूजीसी के नए नियमों पर बवाल: सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की दी मंजूरी, देशभर में विरोध जारी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा लाए गए नए नियमों को लेकर देशभर में सियासी और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। इन नियमों को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने यूजीसी के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने की मंजूरी दे दी है। याचिका में इन नियमों को गैर-समावेशी और जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इस मामले में उच्च शिक्षा के कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर गहन बहस होने की संभावना है।
क्या है यूजीसी और इसका इतिहास?
यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाली एक वैधानिक संस्था है। इसका मुख्य काम देशभर के विश्वविद्यालयों में शिक्षा के स्तर को बनाए रखना, उसका समन्वय करना और उसे नियंत्रित करना है। भारत में उच्च शिक्षा की एक लंबी परंपरा रही है। नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे प्राचीन विश्वविद्यालयों में दूर-दूर से छात्र ज्ञान अर्जित करने आते थे। ब्रिटिश शासनकाल में भी शिक्षा प्रणाली में कई बदलाव हुए। आजादी से पहले ही एक केंद्रीय उच्च शिक्षा नियामक की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी।
- 1944 में सार्जेंट रिपोर्ट में पहली बार विश्वविद्यालय अनुदान समिति बनाने की सिफारिश की गई।
- 1945 में अलीगढ़, बनारस और दिल्ली विश्वविद्यालयों के लिए यूजीसी का प्रारंभिक गठन हुआ।
- 1947 में इसे सभी विश्वविद्यालयों से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी सौंपी गई।
- 1948 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग का गठन किया गया।
- 28 दिसंबर 1953 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने यूजीसी का औपचारिक उद्घाटन किया।
- नवंबर 1956 में यूजीसी अधिनियम, 1956 के तहत इसे कानूनी मान्यता मिली और यह एक स्थायी वैधानिक संस्था बन गई।
मायावती ने क्या कहा?
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिवादी भेदभाव को खत्म करने के लिए इक्विटी कमेटी (समता समिति) बनाने के नियम का विरोध करना गलत है। उन्होंने सामान्य वर्ग के केवल उन लोगों को जातिवादी मानसिकता का बताया, जो इस नियम को अपने खिलाफ साजिश मान रहे हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के नियम लागू करने से पहले सभी पक्षों को विश्वास में लेना बेहतर होता, ताकि सामाजिक तनाव पैदा न हो। उन्होंने दलितों और पिछड़ों से अपील की कि वे अपने ही वर्गों के स्वार्थी और बिकाऊ नेताओं के भड़काऊ बयानों से सावधान रहें।
राजपूत करणी सेना का अर्धनग्न प्रदर्शन और मशाल मार्च
यूजीसी एक्ट 2026 के विरोध में श्री राजपूत करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने मंगलवार को जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने अर्धनग्न होकर परिवर्तन चौक पर सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। उन्होंने प्रधानमंत्री को भेजे ज्ञापन में इस कानून को ‘काला कानून’ बताते हुए इसे तुरंत वापस लेने की मांग की। संगठन के प्रदेश अध्यक्ष दुर्गेश सिंह दीपू के नेतृत्व में कार्यकर्ताओं ने हाथों में मशालें लेकर विधान भवन की ओर मार्च भी किया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उनकी मांग नहीं मानी गई तो देशभर में बड़ा आंदोलन छेड़ दिया जाएगा।
शिक्षा मंत्री का आश्वासन
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यूजीसी के नए नियमों को लेकर लोगों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि सभी को भरोसा दिलाता हूं कि इस कानून से किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा और न ही कोई इसका दुरुपयोग कर सकेगा। मंत्री ने जोर देकर कहा कि इन नियमों का मकसद उच्च शिक्षा में निष्पक्षता और समानता को बढ़ावा देना है। उन्होंने सभी शिक्षण संस्थानों से इन नियमों को जिम्मेदारी से लागू करने की अपील की। मंत्री का यह बयान देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों और बहसों के बीच आया है।
उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन जारी
यूजीसी के नए इक्विटी नियमों के खिलाफ उत्तर प्रदेश के अलीगढ़, संभल और कुशीनगर में छात्रों और सामाजिक संगठनों ने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने इन नियमों को भेदभावपूर्ण बताते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों का ज्ञापन केंद्र सरकार को भेजने का आश्वासन दिया है।
छात्र अनुज त्रिपाठी ने क्या कहा?
वाराणसी में यूजीसी विधेयक 2026 के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्र अनुज त्रिपाठी ने कहा कि वे इसका कड़ा विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में सभी जातियों के लोग पढ़ने आते हैं। अगर सिर्फ एक ही नजरिए से देखा जाए कि केवल उच्च जातियां ही अत्याचार कर रही हैं, तो यह सही नहीं है। उन्होंने चिंता जताई कि अगर यह कानून पारित हो जाता है, तो आपसी स्नेह खत्म हो जाएगा और लोग एक-दूसरे से डरने लगेंगे। उन्होंने कहा कि हर किसी के परिवार की तरफ से दबाव होता है कि अगर किसी को गलत समझा जाए तो उससे संबंध तोड़ लें।
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
यूजीसी के नए कानून को लेकर विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। कई याचिकाकर्ताओं ने नए नियम को चुनौती देते हुए इसे संविधान और यूजीसी अधिनियम, 1956 का उल्लंघन बताया है। याचिकाएं खास तौर पर इन नियमों के विनियम 3(सी) को लेकर दायर की गई हैं, जिसे याचिकाकर्ताओं ने मनमाना, बहिष्कार करने वाला और भेदभावपूर्ण करार दिया है।
चंद्रशेखर आजाद की प्रतिक्रिया
आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के अध्यक्ष और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि एससी, एसटी और ओबीसी का दर्द कोई और नहीं समझ सकता। उन्होंने कहा कि ये दिशा-निर्देश एससी, एसटी या ओबीसी समुदाय के लोगों ने नहीं बनाए हैं, बल्कि बढ़ते मामलों को देखते हुए एक समिति ने इन्हें तैयार किया है।