बाल संरक्षण में टेक दिग्गजों की बढ़ी चूक: एक साल में शिकायतों में 41% का उछाल
दुनियाभर में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री एक गंभीर चिंता का विषय बनी हुई है। बड़ी टेक कंपनियों के पास इस समस्या से निपटने के लिए तकनीकी संसाधन मौजूद होने के बावजूद, वे इसे प्रभावी ढंग से रोकने में विफल साबित हो रही हैं। ऑस्ट्रेलिया की ई-सेफ्टी कमिश्नर की हालिया रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि पिछले एक साल में बाल शोषण से जुड़ी शिकायतों में 41 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह आंकड़ा तकनीकी प्रगति और कड़े कानूनों के बावजूद बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा में गंभीर खामियों को उजागर करता है।
बढ़ता खतरा और बढ़ती शिकायतें
ऑस्ट्रेलियन सेंटर टू काउंटर चाइल्ड एक्सप्लॉइटेशन (ACCSE) के अनुसार, वर्ष 2024-25 में लगभग 83,000 ऑनलाइन बाल यौन शोषण से संबंधित रिपोर्ट दर्ज की गईं। यह संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 41 प्रतिशत अधिक है। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश मामले प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए थे। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब हाल ही में ग्रोक एआई द्वारा महिलाओं की आपत्तिजनक तस्वीरें बनाने और ऑस्ट्रेलिया में 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदमों के बावजूद समस्या पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है।
रिपोर्टिंग और पारदर्शिता की नई पहल
इस बढ़ते खतरे को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया की ई-सेफ्टी कमिश्नर जूली इनमैन ग्रांट ने गूगल, एपल, माइक्रोसॉफ्ट और मेटा जैसी बड़ी टेक कंपनियों को हर छह महीने में पारदर्शिता रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। हाल ही में जारी इस रिपोर्ट में कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले हैं, लेकिन साथ ही कई गंभीर सुरक्षा कमियां भी सामने आई हैं। रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट हुई है कि कंपनियों की ओर से किए जा रहे प्रयास अभी भी अपर्याप्त हैं।
कुछ सुधार, लेकिन बड़ी खामियां बरकरार
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ कंपनियों ने शोषण सामग्री, एआई-जनित कंटेंट, लाइव-स्ट्रीमिंग दुरुपयोग, ऑनलाइन ग्रूमिंग और यौन जबरन वसूली की पहचान में प्रगति दिखाई है। मॉडरेशन के समय में भी कमी आई है। उदाहरण के लिए, स्नैपचैट की मूल कंपनी Snap ने अपने प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री पर कार्रवाई के समय को 90 मिनट से घटाकर 11 मिनट कर दिया है। माइक्रोसॉफ्ट ने भी Outlook में ऐसी सामग्री की पहचान के दायरे को बढ़ाया है।
हालांकि, रिपोर्ट यह भी बताती है कि मेटा और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियां अब भी Messenger और Google Meet जैसी वीडियो कॉलिंग सेवाओं पर लाइव-स्ट्रीमिंग के माध्यम से होने वाले शोषण की निगरानी नहीं कर रही हैं, जबकि उनके अन्य प्लेटफॉर्म पर डिटेक्शन टूल्स मौजूद हैं। एपल और डिस्कॉर्ड पर भी सक्रिय डिटेक्शन सिस्टम की कमी है। एपल अभी भी अधिकांश मामलों में स्वचालित सुरक्षा तकनीक के बजाय उपयोगकर्ता रिपोर्ट पर ही निर्भर है।
लाइव वीडियो और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म: सबसे बड़ी चुनौती
रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि एपल, डिस्कॉर्ड, गूगल चैट, मीट और मैसेजेस, माइक्रोसॉफ्ट टीम्स और स्नैप जैसे प्लेटफॉर्म बच्चों से जुड़े यौन जबरन वसूली की पहचान के लिए उपलब्ध सॉफ्टवेयर का उपयोग नहीं कर रहे हैं। सबसे बड़ी चिंता लाइव वीडियो और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म को लेकर है, जहां शोषण की पहचान के लिए अभी भी पर्याप्त उपकरण नहीं लगाए गए हैं। यह एक गंभीर सुरक्षा खाई है, जिसे भरना आवश्यक है।
प्रगति ट्रैक करने के लिए नया डैशबोर्ड
इन रिपोर्टों के साथ ई-सेफ्टी ने एक नया डैशबोर्ड भी लॉन्च किया है, जो टेक कंपनियों की प्रगति को ट्रैक करेगा। इस डैशबोर्ड में यह दिखाया जाएगा कि कंपनियां किन तकनीकों का उपयोग कर रही हैं, उपयोगकर्ताओं की शिकायत के बाद कितनी सामग्री हटाई गई, और सुरक्षा से जुड़े कर्मचारियों की संख्या कितनी है। यह पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
लॉन्च से पहले सुरक्षा साबित करने की जरूरत
ई-सेफ्टी कमिश्नर का मानना है कि केवल रिपोर्टिंग से काम नहीं चलेगा। आवश्यकता ऐसे कानूनों की है, जो कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म लॉन्च करने से पहले ही यह साबित करने के लिए बाध्य करें कि वे सुरक्षित हैं। प्रस्तावित ‘डिजिटल ड्यूटी ऑफ केयर’ कानून के तहत कंपनियों को जोखिमों को पहले से पहचानने और भाषा विश्लेषण सॉफ्टवेयर और चेतावनी संदेश जैसी मौजूदा तकनीकों का उपयोग करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
रोकथाम और जागरूकता भी उतनी ही जरूरी
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सिर्फ पहचान ही नहीं, बल्कि रोकथाम और जागरूकता भी आवश्यक है। चेतावनी संदेश और रियल-टाइम डिटरेंस सिस्टम जैसे उपाय शोषण से जुड़े व्यवहार को काफी हद तक रोक सकते हैं। ऐसे संदेश न केवल गलत गतिविधियों को ब्लॉक करते हैं, बल्कि लोगों को मदद लेने के लिए सही दिशा भी दिखा सकते हैं।
मुनाफे से ऊपर सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी
ई-सेफ्टी कमिश्नर ने स्पष्ट कहा है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता होनी चाहिए। तकनीक पहले से मौजूद है, लेकिन कई कंपनियां मुनाफे और उपयोगकर्ता वृद्धि के डर से इसका पूरा उपयोग नहीं कर रही हैं। मौजूदा रिपोर्टें यह दिखाती हैं कि समाधान मौजूद हैं, लेकिन कार्रवाई की गति बेहद धीमी है। अब आवश्यकता ऐसे सख्त कानूनों की है, जो ऑनलाइन सुरक्षा को केवल एक फीचर नहीं, बल्कि हर प्लेटफॉर्म का मूल आधार बना सकें।