सुप्रीम कोर्ट का गेमिंग कंपनियों को झटका: 28% जीएसटी बरकरार, 2.5 लाख करोड़ की देनदारी तय
भारत में ऑनलाइन गेमिंग उद्योग के लिए एक बड़ा कानूनी झटका सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के उस फैसले को सही ठहराया है जिसमें ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों पर 28 प्रतिशत वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लगाने का प्रावधान है। सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने इस कर को पिछले लेन-देन पर भी लागू करने की अनुमति दी है। इस फैसले के बाद कंपनियों पर करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की भारी टैक्स देनदारी बन गई है।
पुराने नोटिसों पर भी लागू होगा 28% जीएसटी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म को पहले जारी किए गए टैक्स नोटिस वैध हैं। कंपनियों को अब इन नोटिसों के अनुसार भुगतान करना होगा। पहले इन कंपनियों पर ग्रॉस गेमिंग रेवेन्यू (जीजीआर) के आधार पर 18 प्रतिशत की दर से कर लगता था, लेकिन अब यह दर बढ़कर 28 प्रतिशत हो गई है। इस बढ़ोतरी से पूरे उद्योग पर भारी वित्तीय दबाव पड़ने की संभावना है।
प्लेटफॉर्म को मध्यस्थ मानने से इनकार
सुनवाई के दौरान गेमिंग कंपनियों ने तर्क दिया था कि वे केवल एक मध्यस्थ या सुविधा प्रदाता हैं, इसलिए उन पर पूरी दांव राशि पर कर नहीं लगना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि ये प्लेटफॉर्म सिर्फ मध्यस्थ नहीं हैं। अदालत के अनुसार, ये कंपनियां कार्रवाई योग्य दावों की आपूर्ति करती हैं, जो जीएसटी के दायरे में आते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ नियमों को चुनौती देकर कानूनी रूप से जारी टैक्स नोटिस को रद्द नहीं किया जा सकता।
दांव की पूरी राशि पर कर वसूली का रास्ता साफ
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जीएसटी (सीजीएसटी) के उन प्रावधानों को भी बरकरार रखा है जो टैक्स अधिकारियों को विशेष अधिकार देते हैं। अब अधिकारी ऑनलाइन गेमिंग पोर्टल और कैसीनो में लगाए गए दांव की पूरी फेस वैल्यू पर जीएसटी वसूल सकते हैं। यह फैसला उन कंपनियों के लिए बड़ा झटका है जो अब तक केवल अपनी सेवा शुल्क पर कर चुकाती थीं।
कौशल का खेल या सट्टेबाजी: अदालत ने साफ किया
इस मामले में एक बड़ा सवाल यह था कि क्या ऑनलाइन गेमिंग को कौशल का खेल माना जाए या सट्टेबाजी। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्पष्ट रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि जब भी अनिश्चित नतीजों पर पैसा लगाया जाता है, तो उसे सट्टेबाजी ही माना जाएगा। भले ही वह गेम पूरी तरह से कौशल पर आधारित क्यों न हो। जीएसटी के नजरिए से ऐसे सभी लेन-देन को जुआ और सट्टेबाजी की श्रेणी में रखा जाएगा।
उद्योग पर पड़ने वाला प्रभाव
टैक्स विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों को अपनी कारोबारी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। अक्टूबर 2023 से पहले के लेन-देन पर भी 28 प्रतिशत जीएसटी लागू होने से कंपनियों पर पुराने बकाया का भारी बोझ आ गया है। गौरतलब है कि सितंबर 2023 में ही सरकार ने दांव की शुरुआती रकम पर 28 प्रतिशत जीएसटी लगाने के लिए कानूनों में बड़े बदलाव किए थे। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने उन संशोधनों को कानूनी मंजूरी दे दी है।
इस फैसले से भारत में ऑनलाइन गेमिंग उद्योग के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। छोटी और मझोली कंपनियों के लिए यह देनदारी चुकाना मुश्किल हो सकता है, जबकि बड़ी कंपनियों को अपने वित्तीय प्रबंधन में बदलाव करने पड़ सकते हैं। अदालत का यह फैसला सरकार के उस रुख को मजबूत करता है जिसमें ऑनलाइन गेमिंग को एक गंभीर कर योग्य गतिविधि माना गया है।