शनि जयंती 2026: साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव से मुक्ति के लिए करें इस स्तोत्र का पाठ

शनि जयंती का पर्व इस वर्ष 16 मई 2026, शनिवार को मनाया जाएगा। यह तिथि हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को आती है। शनिवार के दिन पड़ने के कारण इसे शनिश्चरी अमावस्या और शनि अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या के दिन ही भगवान शनिदेव का जन्म हुआ था, इसलिए यह तिथि शनि उपासना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन शनिदेव की पूजा करने और दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। विशेष रूप से वे लोग जो शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या से गुजर रहे हैं, उन्हें इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से सभी प्रकार की बाधाएं समाप्त होने लगती हैं। आइए, इस स्तोत्र के पाठ के लाभों के बारे में विस्तार से जानते हैं।

दशरथ कृत शनि स्तोत्र के पाठ के लाभ

  • शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के दुष्प्रभावों में कमी आती है।
  • भगवान शनिदेव की कृपा प्राप्त होती है।
  • स्वास्थ्य और संबंधों से जुड़ी समस्याएं दूर होने लगती हैं।
  • जीवन में आने वाली बाधाओं और परेशानियों से राहत मिलती है।
  • कार्यों में आ रही रुकावटें धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं।
  • मानसिक तनाव और भय में कमी आती है।

दशरथकृत शनि स्तोत्र

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:।।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते।।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते।।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने।।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च।।

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते।।

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।।

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्।।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:।।

प्रसाद कुरु मे सौरे वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:।।

शनिदेव को प्रसन्न करने वाले सरल मंत्र

“ॐ शं शनैश्चराय नमः”
“ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः”
“ॐ शन्नो देविर्भिष्ठयः आपो भवन्तु पीतये। सय्योंरभीस्रवन्तुनः।।”

शनि का पौराणिक मंत्र

ऊँ ह्रिं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
छाया मार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।।

अस्वीकरण: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है। प्रस्तुत सूचना और तथ्यों की सटीकता और पूर्णता के लिए कोई दावा नहीं किया जाता है।