आसमान से सीधा संपर्क: 2030 तक हर दूसरा स्मार्टफोन होगा सैटेलाइट-रेडी
मोबाइल नेटवर्क की पहुंच की सीमाएं अब टूटने लगी हैं। आने वाले समय में स्मार्टफोन सीधे अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों से जुड़कर काम करेंगे। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यह तकनीक 2030 तक आम हो सकती है, लेकिन इसके पीछे कई बड़ी चुनौतियां और दिलचस्प रणनीतियां छिपी हैं। प्रतिष्ठित रिसर्च फर्म काउंटरपॉइंट रिसर्च के अनुसार, सैटेलाइट कनेक्टिविटी वाले स्मार्टफोन बाजार में तेजी से अपनी जगह बना रहे हैं। अनुमान है कि साल 2030 तक दुनिया भर में बिकने वाले कुल स्मार्टफोन में से लगभग 46 प्रतिशत यानी करीब आधे फोन ‘डायरेक्ट-टू-सैटेलाइट’ कनेक्टिविटी से लैस होंगे।
शुरुआत कैसे हुई और अब कौन-कौन दौड़ में शामिल है?
इस क्रांति की नींव रखने का श्रेय एपल को जाता है। 2022 में आईफोन 14 के साथ एपल ने सैटेलाइट एसओएस फीचर लॉन्च कर दुनियाभर में तहलका मचा दिया था। इसके लिए एपल ने उपग्रह कंपनी ग्लोबलस्टार के साथ साझेदारी की थी। दिलचस्प बात यह है कि हाल ही में ई-कॉमर्स दिग्गज अमेजन ने ग्लोबलस्टार का अधिग्रहण कर लिया है। इस खरीदारी ने अमेजन के लिए ‘कनेक्टिविटी-एज-ए-सर्विस’ का एक विशाल बाजार खोल दिया है। एपल के बाद 2023 में चीनी कंपनी हुआवेई ने भी अपने फोन में यह सुविधा देनी शुरू कर दी। आज के समय में सैमसंग, गूगल, शाओमी, ओप्पो और वीवो जैसे दस से अधिक प्रमुख स्मार्टफोन ब्रांड अपने चुनिंदा मॉडलों में सैटेलाइट कनेक्टिविटी प्रदान कर रहे हैं।
कौन सी कंपनी कहां खड़ी है?
काउंटरपॉइंट के प्रमुख विश्लेषक सौमेन मंडल के अनुसार, सैटेलाइट कनेक्टिविटी वाले फोन बेचने के मामले में एपल आज भी सबसे बड़ा खिलाड़ी बना हुआ है। वहीं, एंड्रॉइड की दुनिया में सैमसंग इस मामले में सबसे आगे चल रहा है। एपल, हुआवेई और गूगल अपने निजी उपग्रह नेटवर्क का उपयोग करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसके विपरीत, सैमसंग और अन्य चीनी ब्रांड 3GPP NTN नामक एक साझा मानक को अपना रहे हैं। इन कंपनियों का लक्ष्य भविष्य में इस तकनीक को बड़े पैमाने पर और आसानी से सभी के लिए उपलब्ध कराना है।
यह सुविधा केवल महंगे फोनों तक ही क्यों सीमित है?
फिलहाल, सैटेलाइट कॉलिंग की सुविधा ज्यादातर बहुत ही प्रीमियम यानी महंगे स्मार्टफोन में ही मिल रही है। इसकी मुख्य वजह यह है कि अभी इस तकनीक का उपयोग मुख्य रूप से आपातकालीन संदेश भेजने तक ही सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इस तकनीक में कोई बड़ा और आम उपयोग का मामला नहीं जुड़ता, जैसे सामान्य कॉलिंग या इंटरनेट, तब तक आम लोग इसे ज्यादा महत्व नहीं देंगे। 3GPP रिलीज 18 के आने से यह सुविधा प्रीमियम फोन में और फैलेगी, लेकिन आम आदमी के बजट वाले मिड-रेंज फोन में इसकी एंट्री 3GPP रिलीज 19 के आने के बाद ही संभव हो पाएगी।
अमेरिका बना अग्रणी, दुनिया कर रही इंतजार
वर्तमान में सैटेलाइट कनेक्टिविटी के क्षेत्र में अमेरिका सबसे आगे है। वहां की बड़ी टेलीकॉम कंपनियों ने इस दिशा में बड़े कदम उठाए हैं। उदाहरण के लिए, टी-मोबाइल ने स्पेसएक्स के साथ और एटीएंडटी ने एएसटी मोबाइल के साथ साझेदारी की है। हालांकि, यूरोप और चीन जैसे अन्य बड़े बाजारों में टेलीकॉम कंपनियां अभी इस तकनीक को लाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रही हैं। इन देशों में सैटेलाइट कनेक्टिविटी के लिए बुनियादी ढांचा और नियामक मंजूरी जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।
- सैटेलाइट कनेक्टिविटी वाले स्मार्टफोन का बाजार 2030 तक 46% तक पहुंचने का अनुमान है।
- एपल ने 2022 में सैटेलाइट एसओएस फीचर के साथ इस तकनीक की शुरुआत की थी।
- सैमसंग और चीनी ब्रांड एक साझा मानक (3GPP NTN) अपना रहे हैं।
- फिलहाल यह सुविधा केवल प्रीमियम फोन तक सीमित है, मिड-रेंज फोन में बाद में आएगी।
- अमेरिका में टी-मोबाइल और एटीएंडटी जैसी कंपनियां इस क्षेत्र में अग्रणी हैं।