एआई का प्रभाव और कौशल विकास की चुनौती: आईआईएम निदेशक प्रो. एमपी गुप्ता के विचार

एक महत्वपूर्ण चर्चा में आईआईएम के निदेशक प्रो. मनमोहन प्रसाद गुप्ता ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव और इससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि एआई अब जीवन के हर पहलू को बदलने की क्षमता रखता है, लेकिन असली चुनौती यह नहीं है कि यह तकनीक आएगी या नहीं, बल्कि यह है कि देश इसके लिए आवश्यक कौशल कैसे विकसित करेगा। उनके अनुसार, आने वाली पीढ़ी के सामने चुनौतियां बढ़ रही हैं, क्योंकि एआई हर क्षेत्र को प्रभावित करेगा और इसके लिए तैयार रहना अनिवार्य है।

नए शैक्षिक कार्यक्रम और नवाचार पर जोर

प्रो. गुप्ता ने अपने संस्थान द्वारा शुरू किए जा रहे नए कार्यक्रमों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्थान 2-3 नए प्रोग्राम लॉन्च कर रहा है, जिनका उद्देश्य प्रदेश के हर जिले तक शिक्षा की पहुंच बनाना है। एक विशेष कार्यक्रम के तहत जेईई एडवांस के 60 छात्रों का चयन कर उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन पहलों का मकसद केवल कॉरपोरेट नौकरियों के लिए तैयारी करना नहीं है, बल्कि नवाचार को बढ़ावा देना है।

उन्होंने एक दूरदर्शी योजना साझा करते हुए कहा, “हमारा प्रयास है कि आज के 60 छात्र अगले चार वर्षों में 60 कंपनियां खड़ी करें और ये कंपनियां आगे दूसरे युवाओं को रोजगार देने का काम करें। यही हमारी प्रतिबद्धता है।” इस बयान से साफ है कि शिक्षा को रोजगार सृजन और उद्यमिता से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है।

एआई सीखना और रोजगार बाजार में बदलाव

प्रो. गुप्ता ने इस बात पर प्रकाश डाला कि आज के समय में एआई सीखना शिक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है। यह तकनीक रोजगार बाजार में बड़ा बदलाव लाएगी। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ क्षेत्रों में नौकरियां घट सकती हैं, लेकिन साथ ही विकास की संभावनाएं भी बढ़ेंगी। इसलिए जरूरी है कि बच्चों में एआई के माध्यम से ज्ञान, कौशल और समझ विकसित की जाए। यह केवल तकनीकी शिक्षा नहीं, बल्कि एक समग्र दृष्टिकोण है जो छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करेगा।

तकनीकी निर्भरता और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता

अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए प्रो. गुप्ता ने तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज हम तकनीक के इस्तेमाल में ज्यादातर “उपयोगकर्ता” की भूमिका में हैं। हमें यह समझना होगा कि कंप्यूटर, मोबाइल, चिप और अन्य उपकरण कहां से आ रहे हैं और इनके पीछे नवाचार और पेटेंट किसके पास हैं। उन्होंने तीन मुख्य प्रश्न उठाए:

  • तकनीक और उपकरणों का निर्माण कौन कर रहा है?
  • ये चिप और डिवाइस कहां बन रहे हैं?
  • इनका उपयोग कौन कर रहा है?

उन्होंने स्पष्ट किया कि इन तीनों आयामों में हम अभी मुख्य रूप से उपयोगकर्ता की भूमिका में हैं, जिसे बदलने की जरूरत है।

भविष्य की चुनौतियां और पूर्वानुमान की भूमिका

प्रो. गुप्ता ने तकनीक के उपयोग को लेकर व्यावहारिक उदाहरण भी दिए। उन्होंने 2012 में उत्तराखंड में आए क्लाउडबर्स्ट का जिक्र किया, जिससे भारी नुकसान हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आने वाले समय में ऐसी घटनाओं की सटीक और पहले से जानकारी मिल सकती है? क्या हम चार घंटे पहले सही पूर्वानुमान कर सकते हैं ताकि नुकसान को कम किया जा सके?

इसी तरह, उन्होंने पुराने बुनियादी ढांचे, जैसे कि हवाड़ा ब्रिज, का उदाहरण देते हुए कहा कि क्या यह जानना संभव है कि वह कब कमजोर हो सकता है या गिर सकता है? ऐसी सटीक जानकारी समय रहते मिलना बहुत जरूरी है, ताकि बड़े हादसों को रोका जा सके। यह दर्शाता है कि एआई और तकनीक का उपयोग केवल आर्थिक विकास के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है।