सेलिब्रिटी शेफ हरपाल सिंह सोखी का संवाद: ‘नमक-शमक’ डायलॉग के पीछे की प्रेरणा

लखनऊ में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम के दूसरे दिन का माहौल पूरी तरह से स्वाद, संघर्ष और सफलता की कहानियों से सजा हुआ था। जहां पहले दिन आध्यात्म और विकास की बातें हुईं, वहीं दूसरे दिन मशहूर सेलिब्रिटी शेफ हरपाल सिंह सोखी ने मंच संभाला। अपने अनोखे अंदाज में उन्होंने जीवन के कई दिलचस्प किस्से सुनाए और खाने से जुड़ी गहरी बातें साझा कीं।

कैसे जन्मा ‘नमक-शमक’ का आइडिया?

‘स्वाद और सफलता का तड़का’ विषय पर बोलते हुए सोखी ने अपनी जिंदगी का एक खास किस्सा सुनाया। उन्होंने बताया कि उनका मशहूर डायलॉग ‘नमक-शमक डाल देते हैं’ असल में प्रबंधन का एक सबक बन गया है। उनके अनुसार, जब तक हम दबाव में नहीं आते, अच्छे विचार नहीं आते। एक बार उनके शो के निर्देशक ने सवाल किया कि लोग मरने के बाद हमें कैसे याद रखेंगे? इस पर सोखी ने जवाब दिया कि जीते-जी लोग याद रख लें, यही काफी है।

शूटिंग खत्म होने के बाद उन्होंने यह बात अपनी बेटी को बताई। बेटी उस वक्त सत्याग्रह पर एक किताब पढ़ रही थी। इसी से उन्हें एहसास हुआ कि नमक सत्याग्रह से जो आंदोलन शुरू हुआ, वह आजादी की लड़ाई में कितना अहम था। गांधीजी ने सबसे छोटी चीज यानी नमक को आंदोलन का हथियार बनाया। सोखी ने इसे खाने से जोड़ा और समझा कि नमक सही मात्रा में हो तो बाकी सारे जायकों को बेहतर बना देता है।

यहीं से ‘नमक-शमक’ का विचार आया। पंजाबी होने के नाते यह शब्द जुबान पर आसानी से आ गया। उन्होंने इसे एक यूरेका मोमेंट बताया। इसके बाद उन्होंने इसे जिंगल के रूप में गाना शुरू किया और आज से 15 साल पहले यह वायरल हो गया। सोखी का मानना है कि यह डायलॉग कम से कम सौ सालों तक किचन में खुशियां बिखेरता रहेगा।

पढ़ाई मजेदार होनी चाहिए

होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई के बारे में बात करते हुए सोखी ने कहा कि उस समय साइंस के छात्र होने के नाते उन्हें लगता था कि इतने सारे विषयों की क्या जरूरत है। लेकिन आज एक उद्यमी के रूप में उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने कानून या अकाउंटिंग ठीक से पढ़ा होता, तो अपना हिसाब-किताब बेहतर तरीके से समझ पाते।

उन्होंने कहा कि युवावस्था में हमें कई चीजें समझ नहीं आतीं। शिक्षा व्यवस्था को हम उत्साहजनक नहीं बना पाते और इसे बोझिल बना देते हैं। इसी से सारी दिक्कतें शुरू होती हैं। पढ़ाई जितनी मजेदार होगी, वह उतनी ही ज्यादा याद रहेगी।

खाने में प्रयोग को लेकर क्या कहा?

खाने में नवाचार पर सोखी ने साफ कहा कि अलग-अलग चीजों का प्रयोग करना कोई अपराध नहीं है। किसी को नहीं पता कि कौन सी चीज कहां काम कर जाएगी। अगर कोई कॉम्बिनेशन सेहत के लिए अच्छा है और स्वाद भी बढ़िया लग रहा है, तो वही सबसे बेस्ट माना जाता है। आज के समय में हर कोई कुछ नया ही खाना चाहता है।

राष्ट्रपति के लिए पकाया खाना

जब उनसे पूछा गया कि हाल ही में वियतनाम के राष्ट्रपति ‘तो लाम’ के लिए आयोजित राजकीय भोज में खाना बनाने का अनुभव कैसा था, तो सोखी ने बताया कि इस भोज से पहले उन्होंने राष्ट्रपति को प्री-टेस्टिंग कराई थी। राष्ट्रपति ने उन्हें पहचान लिया और कहा कि आप तो ‘नमक-शमक’ वाले हैं, आपको मैंने काफी देखा है।

यह सुनकर सोखी को बहुत गर्व महसूस हुआ। राष्ट्रपति ने उनसे कहा कि अब आप पर देश के सम्मान की जिम्मेदारी है। सोखी ने यह जिम्मेदारी बखूबी निभाई और पूरी तरह से भारतीय खाना परोसा। उन्होंने 50 मिनट में 7 से 10 कोर्स का मेन्यू सर्व किया, जिसकी काफी सराहना हुई।

वेज और नॉनवेज खाना अलग बनता है?

बड़े रेस्तरां में वेज और नॉनवेज खाना अलग बनता है या नहीं, इस सवाल पर सोखी ने स्पष्ट किया कि बड़े रेस्तरां में खाना अलग-अलग जगहों पर नहीं बनाया जाता। हाइजीन का सभी बहुत ध्यान रखते हैं। जो रेस्तरां दोनों तरह का खाना परोसते हैं, वहां सेपरेशन नहीं होता, बल्कि कोडिंग के हिसाब से खाना तैयार किया जाता है।

  • लाल चॉपिंग बोर्ड नॉनवेज के लिए होता है
  • हरा चॉपिंग बोर्ड वेज के लिए होता है
  • स्टोरेज का खास ध्यान रखा जाता है
  • एक खाना बनने के बाद बर्तन को तुरंत धोया जाता है, उसके बाद ही दूसरा पकवान बनाया जाता है

एलपीजी की किल्लत पर क्या बोले?

एलपीजी की कमी पर सोखी ने कहा कि इस समस्या में सबसे ज्यादा परेशानी हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री को होती है। उन्होंने माना कि आज के समय में कुछ दिक्कतें हैं। भले ही सभी को सिलिंडर मिल रहा है, लेकिन उसकी कीमत काफी ज्यादा है।

उन्होंने उदाहरण दिया कि अगर किसी की जरूरत 10 सिलिंडर की है और उसे सिर्फ 3 मिल रहे हैं, तो उसे चीजों को मैनेज करना पड़ता है। ऐसे समय में कटौती करनी पड़ती है, जिससे मेन्यू में चीजें कम हो जाती हैं और बिजनेस पर असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि विदेशों में सरकार आगे बढ़कर ऐसी इंडस्ट्री को सपोर्ट करती है, जहां किल्लत होती है।

रेस्तरां पुराने व्यंजनों की ओर लौट रहे हैं

सोखी ने कहा कि चार-पांच साल पहले तक हम बहुत ज्यादा फ्यूजन खाना अपना रहे थे, लेकिन आज रेस्तरां अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। छोटे उद्यमियों द्वारा बनाई गई चीजों को आगे लाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने बेला-चमेली के शरबत का उदाहरण दिया, जिसे उन्होंने बीकानेर में चखा था। यह शरबत शाही महलों में मुखवास के रूप में परोसा जाता था। एक व्यक्ति वहां कुल्हड़ में यह शरबत बेचता था। अब रेस्तरां के जरिए उस उद्यमी को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

सोखी के अनुसार, खाना सिर्फ खाना नहीं, बल्कि जज्बात है और दिल से जुड़ा है। लखनऊ कबाब के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां मलाई-रबड़ी भी उतनी ही मशहूर है। उन्होंने बताया कि भारत में सौ से ज्यादा ऐसे शहर हैं, जो किसी न किसी खास व्यंजन के लिए जाने जाते हैं।

उत्तर प्रदेश में ‘एक जिला, एक व्यंजन’ की शुरुआत को उन्होंने अच्छी पहल बताया। हाल ही में कानपुर जाने पर उन्हें इसके बारे में पता चला। उन्होंने कहा कि उनके रेस्तरां के मेन्यू में भी हर शहर के जायके का जिक्र है। वे वहां जाकर सीखते हैं और फिर उसी नाम से अपने मेन्यू में बेचते हैं, जैसे दीनानाथ महाराज की टमाटर की चाट। सोखी ने जोर देकर कहा कि वे सभी पकवानों की असल पहचान को बरकरार रखते हैं, ताकि लोग उन्हें उसी नाम से पहचानें।