सम्वाद 2026: लखनऊ में एआई संचालित स्मार्ट शिक्षा और बुद्धिमान परिसरों पर विशेषज्ञ मंथन
लखनऊ में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में आ रहे बदलावों पर गहन चर्चा हुई। इस पैनल चर्चा में एकेटीयू के प्रति कुलपति प्रोफेसर राजीव कुमार, आईआईएम लखनऊ के निदेशक प्रोफेसर मनमोहन प्रसाद गुप्ता, जयश्री पेरिवाल ग्रुप्स ऑफ स्कूल्स की संस्थापक डॉ. जयश्री पेरिवाल और सुभारती विश्वविद्यालय के डीन प्रोफेसर मनोज कपिल ने हिस्सा लिया। सभी विशेषज्ञों ने एआई को शिक्षा प्रणाली में शामिल करने के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार साझा किए।
एआई को लेकर बदलती सोच और चुनौतियां
पैनल चर्चा की शुरुआत करते हुए प्रोफेसर राजीव कुमार ने एआई को लेकर समाज में व्याप्त चिंताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जिस तरह जब कंप्यूटर आया था, तब लोगों को नौकरियां जाने का डर सताने लगा था, ठीक वैसी ही स्थिति आज एआई को लेकर है। पिछले कुछ वर्षों में एआई ने जिस तेजी से लोकप्रियता हासिल की है, उससे विश्वविद्यालयों के सामने भी नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे कंप्यूटर साइंस में ही पढ़ाई करें। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि एआई का प्रभाव केवल तकनीकी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। उन्होंने बताया कि वे इस चुनौती का सामना करने के लिए प्रयासरत हैं, ताकि इंजीनियरिंग के अलावा अन्य सभी विषयों में भी छात्रों को एआई की शिक्षा दी जा सके।
स्कूली शिक्षा में एआई का महत्व और सही उपयोग
स्कूली शिक्षा पर एआई के प्रभाव पर चर्चा करते हुए डॉ. जयश्री पेरिवाल ने इसे अपनाने की अनिवार्यता पर जोर दिया। उनके अनुसार, चाहे स्कूल हो या कॉलेज, डॉक्टर हो या शिक्षक, हर किसी को अपने जीवन में आने वाले बदलावों को अपनाना ही होगा। यदि एआई को नहीं अपनाया गया तो पीछे रह जाना तय है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई शिक्षकों की जगह नहीं ले रहा है, बल्कि यह केवल उनकी सहायता कर रहा है। ये उपकरण इसलिए बनाए गए हैं ताकि शिक्षकों को मदद मिल सके। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि एक शिक्षक को एक वर्कशीट बनाने में तीन घंटे लग सकते हैं, लेकिन एआई की मदद से वह अलग-अलग छात्रों की जरूरतों के हिसाब से वैयक्तिकृत शिक्षण सामग्री तैयार कर सकता है। कुछ बच्चे दृश्य माध्यम से बेहतर सीखते हैं, तो कुछ को बार-बार दोहराने से समझ आता है। एआई शिक्षकों को ऐसी विभेदित शीट बनाने में सक्षम बनाता है, जिससे सभी छात्रों को लाभ मिल सके।
एआई का इतिहास और नैतिक शिक्षा की आवश्यकता
प्रोफेसर मनोज कपिल ने एआई के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि एआई कोई नई चीज नहीं है। उन्होंने बताया कि 1956 में दुनिया को पहली बार एआई नाम की एक अवधारणा के बारे में बताया गया था, जिसके बाद धीरे-धीरे इसका विस्तार होता गया। उनके अनुसार, सबसे पहले बच्चों को यह सिखाया जाना चाहिए कि एआई का उपयोग कैसे करना है, इसका कितना उपयोग करना चाहिए, इसका उपयोग कब करना चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण यह कि एआई का उपयोग कब नहीं करना चाहिए। जब ये चार प्रश्न बच्चों के मन में स्पष्ट होंगे, तभी वे इस तकनीक का सही इस्तेमाल कर पाएंगे।
उन्होंने आगे कहा कि यदि एआई को सही दिशा में ले जाया जाए, तो यह चमत्कार कर सकता है। आने वाले वर्षों में दुनिया में बहुत बड़ा बदलाव होने वाला है, और जो लोग एआई का उपयोग नहीं जानते, वे पिछड़ जाएंगे। इसलिए एआई का उपयोग करना बहुत जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही इसके कुछ नैतिक मूल्य भी हैं, जिन्हें बच्चों को सिखाया जाना चाहिए।
एआई पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: एक व्यावहारिक उदाहरण
प्रोफेसर कपिल ने सुभारती विश्वविद्यालय का उदाहरण देते हुए बताया कि वे अपने विश्वविद्यालय में एआई को केवल एक विषय के रूप में नहीं पढ़ाते, बल्कि पिछले दो वर्षों से एआई का एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित कर रहे हैं, जिसमें वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं। इस प्रणाली के तहत, छात्रों की शैक्षणिक प्रक्रियाओं, असाइनमेंट और परीक्षाओं की निगरानी एआई की मदद से की जा रही है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि कौन सा छात्र धीमी गति से सीखने वाला है और कौन तेज गति से। साथ ही, यह भी पता चलता है कि किस छात्र की उपस्थिति कमजोर है।
उन्होंने आगे बताया कि परिसर में लगे एआई-सक्षम कैमरे यह बता सकते हैं कि कौन सा छात्र तनाव में है और किसके लिए तुरंत परामर्श या मार्गदर्शन की आवश्यकता है। यहां तक कि प्लेसमेंट प्रक्रियाओं में भी एआई का उपयोग किया जा रहा है, जिससे छात्रों को बेहतर अवसर प्राप्त करने में मदद मिल रही है।
भारत की भूमिका: उपयोगकर्ता से निर्माता बनने की ओर
आईआईएम लखनऊ के निदेशक प्रोफेसर मनमोहन प्रसाद गुप्ता ने एआई के भविष्य पर अपने विचार रखते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों के सामने नई तरह की चुनौतियां तेजी से उभर रही हैं, क्योंकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब लगभग हर क्षेत्र में अपनी भूमिका निभाने जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब यह चर्चा का विषय नहीं रह गया है कि एआई का विस्तार होगा या नहीं, बल्कि असली जरूरत यह समझने की है कि भारत इस क्षेत्र में अपनी दक्षता और कौशल को किस तरह मजबूत बनाएगा।
प्रोफेसर गुप्ता ने तकनीक, नवाचार और भविष्य की तैयारी पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान समय में भारत मुख्य रूप से तकनीक का उपयोग करने वाले देशों की श्रेणी में खड़ा दिखाई देता है। उन्होंने यह समझने की आवश्यकता पर बल दिया कि सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी से जुड़े उपकरण जैसे कंप्यूटर, मोबाइल, चिप और अन्य डिजिटल डिवाइस आखिर कहां तैयार हो रहे हैं। साथ ही, इन तकनीकों के पीछे मौजूद शोध, नवाचार और पेटेंट किसके नियंत्रण में हैं, इस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने इस पूरे तकनीकी ढांचे को समझने के लिए तीन प्रमुख प्रश्नों पर ध्यान देने की बात कही:
- पहला, तकनीक और डिजिटल उपकरणों का निर्माण कौन कर रहा है?
- दूसरा, चिप और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस किस देश या क्षेत्र में तैयार हो रहे हैं?
- तीसरा, इन तकनीकों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कौन कर रहा है?
उनके अनुसार, इन तीनों पहलुओं में भारत फिलहाल अधिकतर उपयोगकर्ता की भूमिका में दिखाई देता है, जबकि इसे तकनीक के निर्माण और नवाचार में अग्रणी भूमिका निभाने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है।