एआई के युग में शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती: डर नहीं, अनुकूलन जरूरी
लखनऊ में आयोजित एक प्रतिष्ठित शैक्षिक संवाद कार्यक्रम में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के माध्यम से स्मार्ट शिक्षा और बुद्धिमान कैंपस के विषय पर एक विशेष पैनल चर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा में डॉ. राजीव कुमार (प्रो-वाइस चांसलर, एकेटीयू), एक प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान के निदेशक, जयश्री पेरिवाल (संस्थापक एवं अध्यक्ष, जयश्री पेरिवाल ग्रुप ऑफ स्कूल्स) और सुभारती विश्वविद्यालय के डीन ने भाग लिया। चर्चा का केंद्रबिंदु एआई का शिक्षा प्रणाली और भविष्य के रोजगार पर पड़ने वाला प्रभाव था।
कंप्यूटर के आगमन जैसा ही डर
पैनल चर्चा के दौरान डॉ. राजीव कुमार ने एआई को लेकर समाज में व्याप्त भय और भ्रम पर स्पष्टता से बात की। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह एआई को लेकर लोगों में आशंका देखी जा रही है, ठीक वैसा ही माहौल कई दशक पहले कंप्यूटर के आगमन के समय भी था।
उन्होंने बताया, ‘लगभग तीन दशक पहले जब भारत में कंप्यूटर आया था, तब भी यही आशंका जताई जा रही थी कि मशीनें इंसानों की नौकरियां खत्म कर देंगी। उस समय छात्र भी चिंतित थे। लेकिन आगे चलकर क्या हुआ? भारत ने कंप्यूटर और तकनीक को इतनी तेजी से अपनाया कि आज हम आईटी और सेवा क्षेत्र में दुनिया की एक बड़ी ताकत बन गए हैं।’
डॉ. कुमार ने स्पष्ट किया कि एआई भी उसी प्रकार का परिवर्तन है, जिसे रोका नहीं जा सकता। इसलिए इससे भयभीत होने के बजाय इसे समझना और अपनाना आवश्यक है।
एआई केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं
उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले कुछ वर्षों में एआई के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हुए हैं और इसने विश्वविद्यालयों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। उन्होंने बताया कि इंजीनियरिंग की पारंपरिक शाखाओं में छात्रों की रुचि कम हुई है, जबकि अधिकांश छात्र और अभिभावक अब कंप्यूटर साइंस और एआई से जुड़े पाठ्यक्रमों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
डॉ. कुमार ने कहा, ‘आज लगभग हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा कंप्यूटर साइंस या उससे जुड़े क्षेत्र में जाए। लेकिन एआई केवल तकनीक तक सीमित नहीं है। यह प्रबंधन, विधि, फार्मेसी और सामान्य विज्ञान जैसे हर क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है। इसलिए यह चुनौती केवल इंजीनियरिंग संस्थानों की नहीं, बल्कि सभी शैक्षणिक क्षेत्रों की है।’
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय अब केवल कंप्यूटर साइंस के छात्रों को ही नहीं, बल्कि कोर इंजीनियरिंग, फार्मेसी और प्रबंधन के छात्रों को भी एआई में प्रशिक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि वे भविष्य में प्रतिस्पर्धी बने रह सकें।
सबसे बड़ी बाधा: प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी
कैंपस में एआई को लागू करने की चुनौती पर डॉ. राजीव कुमार ने कहा कि सबसे बड़ी समस्या प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि शिक्षक एआई को सही ढंग से नहीं समझेंगे, तो छात्रों तक इसका सही लाभ नहीं पहुंच पाएगा।
उन्होंने कहा, ‘हमारे विश्वविद्यालय का इस समय सबसे बड़ा ध्यान संकाय सदस्यों को एआई में दक्ष बनाने पर है। जब शिक्षक एआई को अच्छी तरह समझेंगे और उसका उपयोग सीखेंगे, तभी इसका लाभ सीधे छात्रों तक पहुंचेगा।’
उनके अनुसार, जब संकाय एआई को अपनाएगा तो इसका प्रभाव स्वतः छात्रों तक पहुंचेगा और पूरा शैक्षणिक माहौल तकनीक के अनुरूप बदलने लगेगा।
रटने की शिक्षा का अंत
चर्चा के दौरान जयश्री पेरिवाल ने एआई के उपयोग और उसके सही इस्तेमाल पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि यह सच है कि बच्चे अब होमवर्क और असाइनमेंट के लिए चैटजीपीटी जैसे उपकरणों का उपयोग कर रहे हैं, लेकिन इससे शिक्षा खत्म नहीं हो जाएगी।
उन्होंने कहा कि अब शिक्षकों को अपने पढ़ाने और प्रश्न पूछने के तरीके में बदलाव लाना होगा। यदि शिक्षक केवल सामान्य निबंध लिखने जैसे कार्य देंगे, तो छात्र एआई की मदद ले लेंगे। लेकिन यदि बच्चों को शोध, सर्वेक्षण और विश्लेषण आधारित कार्य दिए जाएं, तो उन्हें स्वयं सोचने और समझने की आवश्यकता पड़ेगी।
जयश्री पेरिवाल ने कहा कि अब शिक्षा को रटने वाली प्रणाली से निकालकर आलोचनात्मक सोच पर आधारित बनाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि एआई का सही उपयोग तभी संभव है, जब शिक्षक स्वयं तकनीक को समझें और उसका प्रभावी इस्तेमाल करना सीखें।
एआई न अपनाया तो पीछे रह जाएंगे
पैनलिस्टों ने इस बात पर सहमति जताई कि एआई को शिक्षा प्रणाली में शामिल करना अब विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता है। जो संस्थान और शिक्षक इसे जल्दी अपनाएंगे, वे भविष्य में आगे रहेंगे। डॉ. राजीव कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालयों को अब अपने पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धतियों में आमूलचूल बदलाव लाने होंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि एकेटीयू ने अपने संकाय सदस्यों के लिए एआई प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं और जल्द ही सभी विभागों में एआई-आधारित शिक्षण उपकरणों को लागू किया जाएगा। इससे न केवल शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ेगी बल्कि छात्र भी उद्योग की मांग के अनुरूप तैयार हो सकेंगे।