शिक्षा के भविष्य में एआई की अनिवार्यता: डॉ. पेरिवाल का स्पष्ट संदेश

शिक्षा जगत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को लेकर चल रही बहस के बीच एक महत्वपूर्ण बातचीत में डॉ. जयश्री पेरिवाल ने स्पष्ट किया कि एआई को अपनाना अब कोई विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि जो संस्थान और व्यक्ति इस तकनीक को समय पर नहीं अपनाएंगे, वे डायनासोर की तरह विलुप्त होने के खतरे का सामना करेंगे। यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब स्मार्ट शिक्षा और एआई कैंपस जैसे विषयों पर गहन मंथन किया जा रहा है।

डॉ. पेरिवाल ने जोर देकर कहा कि एआई को अपनाने का अर्थ केवल तकनीक को कक्षा में लाना नहीं है, बल्कि इसके सही उपयोग के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। उन्होंने इसे ‘दोधारी तलवार’ की संज्ञा दी, जो सही उपयोग से सशक्त बना सकती है, लेकिन लापरवाही से नुकसान भी पहुंचा सकती है।

शिक्षकों की भूमिका में बदलाव

चर्चा के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि एआई शिक्षकों को बदलने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सहायता के लिए आया है। डॉ. पेरिवाल ने समझाया कि यह तकनीक शिक्षकों को रूटीन के कामों से मुक्ति दिलाती है, जिससे वे बच्चों की व्यक्तिगत जरूरतों पर अधिक ध्यान दे सकें। उदाहरण के लिए, वर्कशीट तैयार करने जैसे कार्य, जिनमें पहले घंटों लगते थे, अब एआई की मदद से मिनटों में हो सकते हैं। यह बदलाव शिक्षकों को अलग-अलग सीखने की गति वाले बच्चों के लिए अधिक प्रभावी सामग्री तैयार करने में सक्षम बनाता है।

व्यक्तिगत सीखने का नया आयाम

हर कक्षा में छात्रों की समझने की क्षमता अलग-अलग होती है। कुछ बच्चे तुरंत समझ जाते हैं, जबकि कुछ को बार-बार समझाने की आवश्यकता होती है। कई बार बच्चे यह कहने में संकोच करते हैं कि उन्हें कुछ समझ नहीं आया। डॉ. पेरिवाल के अनुसार, एआई इस चुनौती का समाधान प्रस्तुत करता है। यह तकनीक हर बच्चे को अपनी गति से सीखने का अवसर देती है, जिससे शिक्षा अधिक समावेशी और प्रभावी बनती है।

एआई का दायरा: स्कूल से परे

डॉ. पेरिवाल ने यह भी रेखांकित किया कि एआई के लाभ केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। उनका मानना है कि यदि यह तकनीक सभी के लिए सुलभ हो जाए, तो कोई भी व्यक्ति कहीं से भी सीख सकता है। यह शिक्षा को लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है, जहां भौगोलिक और आर्थिक बाधाएं सीखने में बाधा न बनें।

सावधानी और विवेक की आवश्यकता

हालांकि, डॉ. पेरिवाल ने एआई के उपयोग में सावधानी बरतने की भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि अगर इसका गलत इस्तेमाल किया गया, तो यह आलस्य को बढ़ावा दे सकता है और रचनात्मकता को कम कर सकता है। इसलिए इसे अपनाने का तरीका विवेक और समझ का विषय है। शिक्षकों, अभिभावकों और संस्थानों को मिलकर यह तय करना होगा कि एआई का उपयोग कैसे किया जाए ताकि यह छात्रों की सोचने की क्षमता (क्रिटिकल थिंकिंग) को बढ़ाए, न कि कम करे।

आगे की राह

इस चर्चा से यह स्पष्ट है कि एआई शिक्षा के भविष्य को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाने वाला है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम इसे कितनी समझदारी और जिम्मेदारी से अपनाते हैं। डॉ. पेरिवाल का संदेश स्पष्ट है: एआई को नकारना नहीं, बल्कि इसे अपनाकर शिक्षा को और अधिक प्रभावी, समावेशी और भविष्योन्मुखी बनाना ही समय की मांग है।