संघर्ष से सफलता तक: तरुण गुप्ता का ‘हेनफ्रूट’ ब्रांड बनाने का सफर

एक युवक ने एक दिन बाहर से खाना मंगवाया। खाने के दौरान उसे अंडों की गंध और स्वाद में कुछ अंतर महसूस हुआ। यह एक सामान्य घटना थी, लेकिन इसने उसके मन में कई सवाल जगा दिए। बाजार में मिलने वाले अंडों की गुणवत्ता कैसी होती है? क्या उनके लिए कोई निश्चित मानक हैं? जब उसने इस विषय पर गहराई से जानकारी जुटाई, तो पता चला कि भारत में अंडों की स्वच्छता, फीड क्वालिटी और उत्पादन प्रक्रिया को लेकर कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। तब उसे एहसास हुआ कि देश में भरोसेमंद और ब्रांडेड अंडों की भारी कमी है।

यह छोटी सी घटना आगे चलकर एक बड़े बिजनेस आइडिया में बदल गई। जब उस युवक ने यह विचार अपने परिवार के सामने रखा, तो शुरुआत में किसी को भरोसा नहीं हुआ। परिवार का मानना था कि लोग अंडों जैसी सामान्य चीज के लिए अलग से ब्रांड का पैसा नहीं देंगे। हालांकि, उसके पिता ने उस पर विश्वास जताया और पांच लाख रुपये का लोन देकर कोशिश करने का मौका दिया। हम बात कर रहे हैं तरुण गुप्ता की, जिन्होंने अपने जुनून और मेहनत के दम पर ‘हेनफ्रूट’ जैसे बड़े एग ब्रांड की स्थापना की। आज कंपनी सालाना लगभग 300 करोड़ रुपये का कारोबार कर रही है।

पढ़ाई के साथ बिजनेस का सफर

5 अक्टूबर, 1992 को पंचकूला में जन्मे तरुण गुप्ता बचपन से ही कुछ अलग करना चाहते थे। उनके पिता सतेंदर गुप्ता पोल्ट्री फार्म का कारोबार करते थे, जबकि उनकी मां हिंदी शिक्षिका थीं। शुरुआती पढ़ाई पंचकूला से करने के बाद उन्होंने हिमाचल प्रदेश के लॉरेंस स्कूल सनावर से स्कूली शिक्षा पूरी की। इसके बाद चंडीगढ़ से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। कॉलेज के दौरान ही उन्होंने दोस्तों के साथ मिलकर एक मैगजीन शुरू की, हालांकि यह ज्यादा सफल नहीं रही। इसके बाद उन्होंने एक रेस्टोरेंट भी शुरू किया। रेस्टोरेंट अच्छा चलने लगा, लेकिन पढ़ाई और बिजनेस को साथ संभालना मुश्किल था, इसलिए बाद में उसे बेच दिया। उन्होंने होम-स्टे बिजनेस में भी हाथ आजमाया, लेकिन वहां भी उन्हें असफलता मिली। लगातार असफलताओं के बावजूद तरुण ने हार नहीं मानी। वे हर अनुभव से सीखते गए। कॉलेज के अंतिम वर्षों में वे अपने पारिवारिक पोल्ट्री बिजनेस से जुड़ गए।

स्टोर रूम से शुरू हुआ ‘हेनफ्रूट’

वर्ष 2014 में तरुण ने पंचकूला के पास एक गांव में करीब 400 वर्गफीट का छोटा सा स्टोर रूम किराए पर लिया और सिर्फ एक कर्मचारी के साथ ‘हेनफ्रूट’ की शुरुआत की। शुरुआत में वे खुद फार्म से अंडे खरीदते, उन्हें साफ करते, पैकिंग करते और दुकानों तक डिलीवरी देने जाते थे। उस समय वे मुश्किल से 50 से 100 अंडे प्रतिदिन बेच पाते थे। शुरुआती दिनों में कई दुकानदार उनके प्रोडक्ट को रखने से मना कर देते थे। ऐसे में तरुण दुकानों के बाहर खड़े होकर लोगों को उबले अंडों की फ्री सैंपलिंग कराते थे, ताकि ग्राहक स्वाद और गुणवत्ता का अंतर महसूस कर सकें। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा बढ़ने लगा। ग्राहकों को उनका प्रोडक्ट पसंद आने लगा और बाजार में ‘हेनफ्रूट’ की पहचान बनने लगी।

वॉलमार्ट ने ब्रांड को दी जगह

साल 2015 में तरुण की जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ आया, जब वॉलमार्ट ने उनके ब्रांड को अपने एक स्टोर में जगह दी। यह मौका उनके लिए किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं था। वहां लगातार सैंपलिंग और मेहनत के दम पर ‘हेनफ्रूट’ तेजी से लोकप्रिय होने लगा। इसके बाद कंपनी को कई बड़े स्टोर्स में जगह मिलने लगी। लेकिन बिजनेस बढ़ाने के दौरान उन्हें कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। दिल्ली में विस्तार के दौरान उन्हें भारी नुकसान झेलना पड़ा। कई बार दोस्तों से उधार लेना पड़ा और ऐसा लगा कि बिजनेस बंद करना पड़ेगा। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वे ग्राहकों की शिकायत खुद सुनते और गुणवत्ता सुधारने पर लगातार काम करते रहे।

जोखिम से मिली बड़ी सफलता

बिजनेस को आगे बढ़ाने के लिए नई मशीनों और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत थी, लेकिन उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। तब तरुण ने बड़ा जोखिम उठाते हुए अपना घर गिरवी रख दिया। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन उन्हें अपने सपने पर भरोसा था। उनका यह जोखिम सही साबित हुआ। इसके बाद ‘हेनफ्रूट’ तेजी से आगे बढ़ने लगा। कंपनी ने गुणवत्ता और भरोसे को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। आज ‘हेनफ्रूट’ प्रतिदिन लगभग 14 से 15 लाख अंडों की बिक्री करता है और देशभर में अपनी मजबूत पहचान बना चुका है।

युवाओं के लिए सीख

  • एक छोटी समस्या में भी एक बड़ा अवसर छिपा होता है।
  • असफलता सफलता की पहली सीढ़ी होती है।
  • शुरुआत भले ही छोटी हो, पर सोच बड़ी रखनी चाहिए।
  • जोखिम उठाए बिना बड़ी सफलता नहीं मिलती।
  • भीड़ से अलग सोच ही पहचान बनाती है।