बच्चों के डेटा की सुरक्षा को लेकर एनएचआरसी का सख्त रुख, मेटा-व्हाट्सएप समेत कई प्लेटफॉर्म को नोटिस

देश में डिजिटल डेटा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने कई बड़ी टेक कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। यह कार्रवाई डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) के उल्लंघन की शिकायतों के आधार पर की गई है। आयोग ने विशेष रूप से बच्चों के डेटा की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। शिकायतों में आरोप लगाया गया है कि कई प्लेटफॉर्म बच्चों के डेटा को ट्रैक करने और उनकी शिकायतों के समाधान के लिए आवश्यक व्यवस्था नहीं कर रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

आज के डिजिटल युग में बच्चे पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक के लिए इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित एप्लिकेशन का इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या उनकी निजी जानकारी सुरक्षित है? एशिया (ASIA) नामक एक थिंक टैंक की रिपोर्ट ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंताएं जताई हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सोशल मीडिया, एआई और एडटेक प्लेटफॉर्म बच्चों के डेटा की निगरानी और शिकायत निवारण के मामले में लापरवाही बरत रहे हैं।

इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए एनएचआरसी ने मामले को अपने हाथ में ले लिया है। आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले की जांच शुरू की है। आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), शिक्षा मंत्रालय और संचार मंत्रालय को नोटिस जारी कर इस मामले में स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

कटघरे में ये बड़ी कंपनियां

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी प्रारंभिक जांच में पाया कि कई बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म डीपीडीपी एक्ट के नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं कर रहे हैं। इन प्लेटफॉर्म्स की सूची में शामिल हैं:

  • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म: मेटा और व्हाट्सएप जैसी दिग्गज कंपनियां, जो बच्चों के डेटा को सुरक्षित रखने में विफल पाई गई हैं।
  • एआई प्लेटफॉर्म: जेमिनी, ग्रोक और परप्लेक्सिटी जैसे लोकप्रिय एआई टूल, जिनके जरिए बच्चे जानकारी प्राप्त करते हैं।
  • शैक्षिक प्लेटफॉर्म: खान अकादमी और माइक्रोसॉफ्ट मैथ सॉल्वर जैसे एडटेक प्लेटफॉर्म भी इस जांच के दायरे में हैं।

बच्चों के सिम कार्ड पर भी उठे सवाल

आयोग ने बच्चों को मोबाइल सिम कार्ड जारी करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। देश में नाबालिगों के नाम पर सिम पंजीकरण को लेकर स्पष्ट नियमों और पारदर्शी जानकारी का अभाव सामने आया है। यह सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ी खामी हो सकती है, क्योंकि इसका फायदा उठाकर किसी भी तरह का दुरुपयोग किया जा सकता है। आयोग ने इस मामले में भी सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है।

15 दिनों में मांगा गया जवाब

एनएचआरसी ने इन कमियों को बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बताया है। आयोग ने सभी संबंधित संस्थाओं और मंत्रालयों को 15 दिनों के भीतर अपना जवाब देने और सुधारात्मक कदमों की जानकारी देने का निर्देश दिया है। आयोग ने यह भी संकेत दिया है कि भविष्य में बुजुर्गों और अन्य संवेदनशील वर्गों की डिजिटल सुरक्षा को लेकर भी इसी तरह की सख्त कार्रवाई की जा सकती है।

क्या कहता है कानून?

भारत में वर्ष 2023 में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) बनाया गया था। इसके नियम 2025 के अंत में लागू हुए हैं। इस कानून का मुख्य उद्देश्य बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों जैसे संवेदनशील वर्गों को ऑनलाइन होने वाले खतरों से बचाना है। हालांकि, कानून के कुछ प्रावधानों के पालन के लिए कंपनियों को समय दिया गया है, लेकिन डेटा निगरानी, सर्वर सुरक्षा और शिकायत निवारण जैसे नियमों को तुरंत लागू करना अनिवार्य है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, जिसके पास सिविल कोर्ट के समान अधिकार हैं। इसके सदस्यों का दर्जा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के बराबर होता है। इस मामले में आयोग की सख्ती से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि बच्चों के डेटा से किसी भी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।