राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6: मातृ-शिशु स्वास्थ्य में सुधार के संकेत

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) की रिपोर्ट देश के स्वास्थ्य क्षेत्र में सकारात्मक बदलावों की ओर इशारा करती है। इस सर्वेक्षण में देशभर के 715 जिलों के लगभग 6.79 लाख परिवारों को शामिल किया गया, जिससे स्वास्थ्य, पोषण और परिवार कल्याण से जुड़े अहम आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मातृ-शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण और बच्चों के पोषण में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, हालांकि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को लेकर सावधानी बरतने की भी आवश्यकता है।

गर्भवती महिलाओं की देखभाल में बड़ा सुधार

सर्वेक्षण के नतीजे बताते हैं कि देश में गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व देखभाल मिलने का प्रतिशत बढ़कर 95.9 प्रतिशत हो गया है। यह आंकड़ा पिछले सर्वेक्षणों की तुलना में काफी बेहतर है। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव कराने वाली महिलाओं की संख्या 88.6 प्रतिशत से बढ़कर 90.6 प्रतिशत पर पहुंच गई है। गर्भावस्था के पहले तीन महीनों में देखभाल प्राप्त करने वाली माताओं का अनुपात 70 प्रतिशत से बढ़कर 76.2 प्रतिशत हो गया है। कम से कम चार बार प्रसवपूर्व जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या में भी 58.5 प्रतिशत से 65.2 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है। कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की उपस्थिति में होने वाले जन्म का आंकड़ा 89.4 प्रतिशत से बढ़कर 91.3 प्रतिशत हो गया है, जो सुरक्षित प्रसव को बढ़ावा देने में मील का पत्थर साबित हो रहा है।

बच्चों के टीकाकरण में मजबूत प्रगति

टीकाकरण के मोर्चे पर भारत लगातार मजबूत कदम बढ़ा रहा है। 12 से 23 महीने की उम्र के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण का दायरा 83.8 प्रतिशत से बढ़कर 87.1 प्रतिशत हो गया है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से 95.6 प्रतिशत से अधिक बच्चों को टीके लगाए जा रहे हैं। खसरे के टीके की दूसरी खुराक का कवरेज 58 प्रतिशत से काफी बढ़कर 71.8 प्रतिशत पर पहुंच गया है। रोटावायरस वैक्सीन की तीनों खुराक का कवरेज 36.4 प्रतिशत से बढ़कर 85.4 प्रतिशत हो गया है, जो बच्चों में डायरिया के खतरे को कम करने में मददगार साबित हो रहा है।

बाल मृत्युदर और डायरिया में कमी

पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में तेजी से गिरावट आई है। 2014 में प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 45 मौतें थीं, जो 2024 में घटकर 28 पर आ गई हैं। डायरिया यानी दस्त के मामलों में भी काफी कमी आई है। एनएफएचएस-5 में जहां डायरिया की व्यापकता 0.7 प्रतिशत थी, वहीं एनएफएचएस-6 में यह घटकर 0.5 प्रतिशत रह गई है। बेहतर टीकाकरण कवरेज, सुरक्षित पेयजल तक पहुंच और स्वच्छता कार्यक्रमों के चलते यह सफलता मिली है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में गंभीर दस्त के मामलों में भी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे डायरिया के कारण होने वाली मौतों में कमी आई है।

स्वास्थ्य बीमा और वित्तीय सुरक्षा में विस्तार

सर्वेक्षण के अनुसार, स्वास्थ्य बीमा और वित्तपोषण योजनाओं का दायरा परिवारों के स्तर पर 41 प्रतिशत से बढ़कर 60.2 प्रतिशत हो गया है। आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री जन आरोग्य जैसी योजनाओं ने विशेष रूप से कमजोर वर्गों के लिए सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। इससे इलाज के खर्च का बोझ कम हुआ है और अधिक लोग स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।

प्रजनन दर और परिवार नियोजन में स्थिरता

भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 पर स्थिर बनी हुई है, जो जनसंख्या नियंत्रण के लिहाज से एक संतुलित स्थिति मानी जा रही है। गर्भनिरोधक उपयोग दर 66.7 प्रतिशत से बढ़कर 69.1 प्रतिशत हो गई है। राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन के चलते ये परिणाम देखने को मिल रहे हैं।

चुनौतियां और आगे की राह

हालांकि स्वास्थ्य के कई मोर्चों पर सुधार हुआ है, लेकिन रिपोर्ट में लाइफस्टाइल से संबंधित बीमारियों के बढ़ते खतरे को लेकर आगाह किया गया है। इसके बावजूद, यह सर्वेक्षण इस बात का प्रमाण है कि सही दिशा में किए गए लगातार प्रयास बड़े बदलाव ला सकते हैं। आंगनवाड़ी सेवाओं, पोषण योजनाओं और स्वच्छता कार्यक्रमों का असर अब साफ नजर आने लगा है। बच्चों की बेहतर सेहत सिर्फ उनके स्वस्थ बचपन की गारंटी नहीं है, बल्कि यह देश के मजबूत भविष्य की नींव भी है।

  • गर्भवती महिलाओं को प्रसवपूर्व देखभाल मिलने का प्रतिशत 95.9 प्रतिशत तक पहुंचा
  • अस्पतालों में प्रसव के मामले 90.6 प्रतिशत पर पहुंचे
  • पूर्ण टीकाकरण का दायरा 87.1 प्रतिशत हुआ
  • डायरिया की व्यापकता 0.5 प्रतिशत पर आई
  • स्वास्थ्य बीमा का दायरा 60.2 प्रतिशत पर पहुंचा
  • प्रजनन दर 2.0 पर स्थिर बनी