एनीमिया मुक्त भारत: नई रणनीति और दिशा-निर्देशों के साथ बदलेगा अभियान का स्वरूप

देश में एनीमिया के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने एक नई और अधिक प्रभावी रणनीति पेश की है। ‘एनीमिया मुक्त भारत’ अभियान के तहत अब नए ऑपरेशनल गाइडलाइन जारी किए गए हैं, जिनमें पहले से चली आ रही रणनीति में बड़े बदलाव किए गए हैं। इस नई योजना का उद्देश्य एनीमिया की रोकथाम, जांच और उपचार को और अधिक सशक्त बनाना है।

पुरानी रणनीति में बड़ा बदलाव: 6×6×6 से 7×7×7 तक

अब तक एनीमिया मुक्त भारत अभियान 6×6×6 रणनीति पर काम कर रहा था, जिसमें छह लाभार्थी समूहों, छह हस्तक्षेपों और छह संस्थागत तंत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाता था। नई गाइडलाइन के अनुसार, इस रणनीति को बढ़ाकर 7×7×7 कर दिया गया है। इस विस्तार का मुख्य उद्देश्य उन वर्गों को भी कवर करना है जो अब तक इस अभियान के दायरे से बाहर थे।

सातवां लाभार्थी समूह: कम वजन वाले नवजात शिशु

नई रणनीति में सबसे अहम बदलाव यह है कि अब जन्म के समय कम वजन वाले शून्य से छह माह तक के नवजात शिशुओं को भी अभियान में शामिल किया गया है। यह सातवां लाभार्थी समूह है। इस कदम का उद्देश्य जीवन के शुरुआती दिनों से ही एनीमिया की रोकथाम शुरू करना है, ताकि आगे चलकर होने वाली जटिलताओं से बचा जा सके।

सातवां हस्तक्षेप: ‘ईटिंग राइट’ पर जोर

अब तक आयरन की गोलियां और दवाएं ही मुख्य हस्तक्षेप थीं, लेकिन नई गाइडलाइन में ‘ईटिंग राइट’ यानी सही खान-पान को सातवें हस्तक्षेप के रूप में शामिल किया गया है। इसके तहत लोगों को आयरन युक्त और संतुलित भोजन के सेवन के लिए प्रेरित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य लोगों की दैनिक खान-पान की आदतों में स्थायी सुधार लाना है, जिससे एनीमिया की जड़ को कमजोर किया जा सके।

सातवां संस्थागत तंत्र: डिजिटल ट्रैकिंग और मॉनिटरिंग

नई रणनीति में डिजिटल तकनीक को विशेष स्थान दिया गया है। डिजिटल ट्रैकिंग, मजबूत मॉनिटरिंग और मूल्यांकन प्रणाली को सातवां संस्थागत तंत्र बनाया गया है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि हर लाभार्थी तक उपचार और दवा पहुंच रही है या नहीं, इसकी नियमित निगरानी की जा सके। सभी रिकॉर्ड डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होंगे, जिससे पारदर्शिता और प्रभावशीलता बढ़ेगी।

सेवा मॉडल में बदलाव: टी-3 से टी-4 मॉडल

सेवा वितरण के मॉडल में भी बड़ा बदलाव किया गया है। पहले ‘टेस्ट, ट्रीट और टॉक’ (टी-3) मॉडल लागू था, जिसे अब बदलकर ‘टेस्ट, ट्रीट, टॉक और ट्रैक’ (टी-4) कर दिया गया है। इस नए मॉडल के तहत चार मुख्य बिंदुओं पर काम होगा:

  • टेस्ट: नियमित रूप से हीमोग्लोबिन की जांच की जाएगी।
  • ट्रीट: आयरन की कमी से होने वाले एनीमिया का उचित इलाज किया जाएगा।
  • टॉक: मरीजों और उनके परिवारों को पोषण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाएगा।
  • ट्रैक: मरीजों की नियमित निगरानी और डिजिटल ट्रैकिंग की जाएगी।

गंभीर मामलों के लिए विशेष प्रावधान

नई गाइडलाइन में गंभीर एनीमिया से पीड़ित गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। उन महिलाओं के लिए जिन पर आयरन की गोलियों का असर नहीं होता, नस के जरिए फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज और आयरन सुक्रोज देने का प्रावधान किया गया है। यह एक अधिक प्रभावी उपचार विकल्प है, जो गंभीर मामलों में तेजी से परिणाम दे सकता है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म का एकीकरण

नई व्यवस्था के तहत एनीमिया से जुड़े सभी रिकॉर्ड को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया जाएगा। गर्भवती महिलाओं की जांच का डेटा जननी पोर्टल पर दर्ज होगा, जबकि बच्चों का रिकॉर्ड आईबीएसएक और यू-विन पोर्टल पर उपलब्ध होगा। भविष्य में इन सभी प्लेटफॉर्म को एकीकृत कर एक समर्पित ‘एनीमिया मुक्त भारत अभियान पोर्टल’ बनाने की योजना है, जिससे पूरे देश में एक समान और पारदर्शी डेटा मैनेजमेंट संभव हो सकेगा।

यह नई गाइडलाइन एनीमिया के खिलाफ जंग में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें जांच, इलाज, पोषण और डिजिटल निगरानी पर एक साथ ध्यान केंद्रित करके एक समग्र दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिससे देश को एनीमिया मुक्त बनाने का लक्ष्य जल्द से जल्द हासिल किया जा सके।