नीट पीजी 2025-26 कटऑफ विवाद: सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, एनबीईएमएस के फैसले को चुनौती

नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन्स इन मेडिकल साइंसेज (NBEMS) द्वारा नीट पीजी 2025-26 के लिए योग्यता कटऑफ में भारी कमी किए जाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। एक जनहित याचिका दायर कर इस कदम को मनमाना और असंवैधानिक बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इस निर्णय से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता, मरीजों की सुरक्षा और पूरी चिकित्सा पद्धति की विश्वसनीयता पर गंभीर संकट पैदा हो गया है।

याचिका का आधार और प्रमुख तर्क

यह जनहित याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन, न्यूरोसर्जन सौरव कुमार, यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल और वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉ. आकाश सोनी ने संयुक्त रूप से दायर की है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह मांग उठाई गई है कि एनबीईएमएस का 13 जनवरी 2026 का नोटिस, जिसमें कटऑफ को असामान्य रूप से निम्न स्तर पर लाया गया, को रद्द किया जाए।

याचिका में स्पष्ट किया गया है कि इस नोटिस के तहत कटऑफ को इतना कम कर दिया गया कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के लिए यह शून्य से भी नीचे यानी माइनस 40 अंक तक पहुंच गया। इसका मतलब यह हुआ कि नकारात्मक अंक प्राप्त करने वाला अभ्यर्थी भी पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए योग्य माना जाएगा। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।

मेरिट और मरीजों की सुरक्षा पर खतरा

याचिका में इस बात पर जोर दिया गया है कि चिकित्सा का क्षेत्र कोई सामान्य पेशा नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़ा हुआ है। ऐसे संवेदनशील क्षेत्र में केवल सीटें भरने के लिए योग्यता मानकों को कम करना बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

  • याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस फैसले से मेरिट की अवधारणा ही खत्म हो जाएगी और प्रतियोगी परीक्षा एक औपचारिकता मात्र रह जाएगी।
  • इससे पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर डॉक्टरों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जो सीधे तौर पर मरीजों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित करेगा।
  • यह कदम राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) अधिनियम, 2019 के वैधानिक प्रावधानों के भी विपरीत है, जो मेडिकल शिक्षा में उच्च मानकों को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था।

याचिका में उठाए गए मुख्य मुद्दे

याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलील में कई अहम बिंदुओं को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि एनबीईएमएस का यह निर्णय पूरी तरह से मनमाना है और बिना किसी वैज्ञानिक या शैक्षणिक आधार के लिया गया है। इस तरह की ढील से मेडिकल शिक्षा के मानकों में गिरावट आएगी और अयोग्य डॉक्टरों की संख्या बढ़ेगी, जो समाज के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि यह फैसला चिकित्सा पेशे की साख को नुकसान पहुंचाएगा और आम जनता का इस पेशे से भरोसा उठ सकता है। पोस्ट ग्रेजुएट स्तर पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, और यदि उनकी नींव ही कमजोर होगी तो पूरी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली प्रभावित होगी।

एनबीईएमएस के फैसले पर विवाद क्यों?

गौरतलब है कि 13 जनवरी 2026 को एनबीईएमएस ने एक नोटिस जारी कर नीट पीजी 2025-26 के लिए क्वालिफाइंग कटऑफ में भारी कमी की घोषणा की थी। इस नोटिस के बाद से ही डॉक्टरों के विभिन्न संगठनों और अभ्यर्थियों में नाराजगी देखी जा रही थी। आलोचकों का कहना था कि इस तरह के फैसले से न केवल शिक्षा का स्तर गिरेगा, बल्कि भविष्य में मरीजों के इलाज में गंभीर समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने के बाद, सभी की निगाहें शीर्ष अदालत के संभावित फैसले पर टिकी हैं। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह इस मनमाने फैसले पर तुरंत रोक लगाए और मेडिकल शिक्षा के मानकों को बनाए रखने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करे।