गोरखपुर की दिव्या सिंह ने साइकिल से जीता एवरेस्ट बेस कैंप, रचा इतिहास
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की एक युवा बेटी ने अपने दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत से पूरे देश का नाम गौरवान्वित किया है। दिव्या सिंह ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट के बेस कैंप तक साइकिल चलाकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वह साइकिल से एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचने वाली भारत की पहली महिला बन गई हैं। इस चुनौतीपूर्ण यात्रा में भयंकर ठंड, बर्फीली हवाएं और दुर्गम पहाड़ी रास्ते उनके सामने आए, लेकिन दिव्या के जुनून और हौसले ने हर बाधा को पार कर लिया। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर मन में सच्ची लगन हो, तो कोई भी मंजिल असंभव नहीं है।
कैसे शुरू हुआ यह साहसिक सफर?
दिव्या सिंह गोरखपुर जिले के सहजनवां क्षेत्र के बनौड़ा गांव की रहने वाली हैं। वह एक निजी स्कूल में छठी से आठवीं कक्षा की छात्राओं को पढ़ाती हैं। उन्होंने राजनीति शास्त्र और होम साइंस में डबल पोस्ट ग्रेजुएट किया है, साथ ही प्राथमिक शिक्षा में डिप्लोमा भी हासिल किया है। उनके पिता संतराज सिंह किसान हैं और मां उर्मिला देवी शिक्षिका हैं। परिवार में सबसे बड़ी बेटी होने के नाते दिव्या बचपन से ही साहसिक कार्यों में रुचि रखती थीं।
सातवीं कक्षा में पढ़ते समय उन्होंने एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल की कहानी पढ़ी। यह कहानी उनके मन में गहराई तक उतर गई और उसी दिन से उन्होंने एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने का सपना देखना शुरू कर दिया। वर्षों तक इस सपने को संजोए रखने के बाद आखिरकार उन्होंने इसे हकीकत में बदल दिया।
डेढ़ साल की कठिन तैयारी और प्रशिक्षण
इस बड़े सपने को साकार करने के लिए दिव्या ने लगभग डेढ़ साल तक कड़ी मेहनत की। उन्होंने बिना पूरी तैयारी के पहाड़ पर जाने का जोखिम नहीं उठाया। साल 2023 और 2024 में वह दो बार पैदल एवरेस्ट बेस कैंप जा चुकी थीं। इस अनुभव ने उनका डर खत्म कर दिया और पहाड़ों की चुनौतियों को समझने का मौका दिया।
साइकिल से इस मिशन पर निकलने से पहले दिव्या ने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी इलाकों में विशेष प्रशिक्षण लिया। इसे ऑफ-रोड माउंटेन साइकिलिंग कहा जाता है, जिसमें पथरीले और टूटे-फूटे रास्तों पर साइकिल चलानी होती है। इस दौरान रस्ट एडवेंचर्स की प्रशिक्षक उमा सिंह ने उनका मार्गदर्शन किया और हर कदम पर हौसला बढ़ाया।
14 दिनों का अभियान और आई चुनौतियां
एवरेस्ट बेस कैंप तक पहुंचने का यह सफर पूरे 14 दिनों का था। इन दिनों में दिव्या लगातार ऊंचे और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर साइकिल चलाती रहीं। हर दिन उन्हें 10 से 12 घंटे तक साइकिल चलानी पड़ती थी, जो शरीर के लिए बेहद कठिन था। जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती गई, रास्ते और भी खतरनाक होते गए। हर नया मोड़ उनके धैर्य, शारीरिक शक्ति और मानसिक मजबूती की परीक्षा लेता रहा।
इस यात्रा के दौरान कई बार ऐसे हालात आए जब साइकिल चलाना नामुमकिन हो गया। भयंकर ठंड और ऑक्सीजन की कमी के कारण सांस लेना भी मुश्किल हो गया था। ऐसे में दिव्या ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी साइकिल को कंधों पर उठाया और पैदल ही आगे बढ़ती रहीं। ठंडी हवाएं और बर्फीले रास्ते उन्हें थका रहे थे, लेकिन उनका संकल्प इन सबसे मजबूत था।
महिलाओं और युवाओं के लिए प्रेरणा
दिव्या सिंह की यह उपलब्धि पूरे देश की महिलाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। एवरेस्ट बेस कैंप तक साइकिल से पहुंचना अपने आप में एक दुर्लभ और कठिन काम है। आमतौर पर इस तरह के साहसिक खेलों में पुरुषों का दबदबा माना जाता है, लेकिन दिव्या ने साबित कर दिया कि महिलाएं किसी से कम नहीं हैं। उनकी कहानी हजारों युवाओं और खिलाड़ियों को यह संदेश देती है कि सीमित साधनों और कठिन परिस्थितियों में भी सपनों को सच किया जा सकता है।
युवाओं के लिए सीख
दिव्या का यह सफर सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि हर युवा के लिए एक सबक है। उन्होंने दिखाया कि अगर आप खुद पर भरोसा करें और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहें, तो दुनिया की कोई भी मंजिल आपसे दूर नहीं है। जीवन में आने वाली कठिनाइयां हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें और मजबूत बनाने के लिए आती हैं। दिव्या का दृढ़ संकल्प और मेहनत यह सिखाती है कि जब इरादे मजबूत हों, तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं लगती।
असंभव को संभव करने का सबूत
दिव्या सिंह की यात्रा इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि पक्के इरादे से कोई भी असंभव काम संभव बनाया जा सकता है। एक छोटे से गांव से निकलकर, एक सामान्य शिक्षिका के रूप में दुनिया की सबसे ऊंची चोटी के बेस कैंप तक पहुंचना यह बताता है कि इंसान की असली ताकत उसके मन में होती है। बिना किसी बड़ी मदद के, खुद के दम पर इतनी खतरनाक परिस्थितियों का सामना करना कोई मामूली बात नहीं है। दिव्या ने साबित कर दिया कि अगर सपनों में जान हो और उन्हें पूरा करने की जिद हो, तो बड़े से बड़े पहाड़ भी झुक जाते हैं। उनकी यह बहादुरी भरी कहानी आने वाले लंबे समय तक लोगों को हिम्मत और हौसला देती रहेगी।