सरकार का सख्त रुख: टेक कंपनियों को तीन घंटे में ही हटाना होगा अवैध कंटेंट, समय सीमा में नहीं होगी कोई ढील

भारत सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अवैध और आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के मामले में अपना रुख और सख्त कर दिया है। हाल ही में आयोजित एक उच्च-स्तरीय बैठक में सरकार ने बड़ी टेक कंपनियों को स्पष्ट कर दिया है कि संशोधित आईटी नियमों के तहत तीन घंटे की समयसीमा में कोई बदलाव या विस्तार नहीं किया जाएगा। यह नियम हर हाल में लागू रहेगा और इसका सख्ती से पालन करना अनिवार्य होगा।

क्या है नया नियम?

सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 में संशोधन किया है। इसके तहत अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को किसी भी गैर-कानूनी या आपत्तिजनक कंटेंट की शिकायत मिलने पर मात्र तीन घंटे के अंदर उसे हटाना होगा। पहले यह समयसीमा 36 घंटे थी, जिसे अब घटाकर तीन घंटे कर दिया गया है। यह नियम 20 फरवरी 2026 से प्रभावी हो चुका है।

इसके अलावा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से तैयार किए जाने वाले कंटेंट जैसे कि फोटो, वीडियो या ऑडियो पर साफ तौर पर लेबल लगाना भी अनिवार्य कर दिया गया है। इससे डीपफेक और भ्रामक सामग्री को पहचानने में मदद मिलेगी।

बैठक में क्या हुआ?

25 फरवरी को आईटी सचिव एस कृष्णन और संयुक्त सचिव अजित कुमार की अध्यक्षता में एक बंद कमरे की बैठक हुई। इसमें यूएस-इंडिया बिजनेस काउंसिल और कई वैश्विक टेक दिग्गजों ने भाग लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य नए नियमों के कार्यान्वयन पर चर्चा करना था। सरकार ने इस बैठक में साफ कर दिया कि अधिसूचित नियमों में किसी भी तरह का बदलाव नहीं होगा और तीन घंटे की समयसीमा को बढ़ाया नहीं जाएगा।

यह आदेश गृह मंत्रालय के सहयोग पोर्टल और आईटी एक्ट की धारा 79(3)(b) के तहत कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा जारी किए जाएंगे। इसका मतलब है कि पुलिस और अन्य जांच एजेंसियां सीधे इस पोर्टल के जरिए कंपनियों को कंटेंट हटाने का निर्देश दे सकेंगी।

टेक कंपनियों की चिंताएं

बैठक में बड़ी टेक कंपनियों ने अपनी व्यावहारिक चुनौतियां सरकार के सामने रखीं। उनका कहना था कि:

  • जटिल मूल्यांकन: डीपफेक या गलत सूचना जैसे मामलों में यह तय करना बेहद मुश्किल होता है कि कंटेंट वास्तव में अवैध है या नहीं। इसके लिए गहन जांच और विशेषज्ञता की जरूरत होती है।
  • कानूनी पेचीदगियां: 180 मिनट का समय कानूनी और तथ्यात्मक जांच के लिए बहुत कम है। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होता है कि वे किसी गलत कंटेंट को न हटाएं, जिससे उन पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
  • तकनीकी बाधाएं: कंपनियों ने पोर्टल एक्सेस में देरी या सिस्टम आउटेज जैसी तकनीकी समस्याओं पर भी चिंता जताई। उनका कहना था कि कभी-कभी पोर्टल ठीक से काम नहीं करता, जिससे समय पर कार्रवाई मुश्किल हो जाती है।

सरकार का स्पष्ट जवाब

कंपनियों की इन चिंताओं पर सरकार ने तर्क दिया कि सोशल मीडिया पर कंटेंट के वायरल होने की गति इतनी तेज है कि देरी से स्थिति और गंभीर हो सकती है। अधिकारियों के अनुसार, बड़े प्लेटफॉर्म्स के पास पहले से ही बड़े पैमाने पर कंटेंट मॉडरेशन करने की तकनीकी क्षमता मौजूद है। उन्हें रियल-टाइम रिस्पॉन्स सिस्टम विकसित करना चाहिए ताकि वे तुरंत कार्रवाई कर सकें।

सरकार ने यह भी कहा कि भले ही वह डेडलाइन नहीं बढ़ा रही है, लेकिन वह कंपनियों की तकनीकी मदद करने को तैयार है। आने वाले समय में विशेष कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा, जिसमें पोर्टल के उपयोग और तकनीकी बाधाओं को दूर करने के तरीके सिखाए जाएंगे।

कानूनी पहलू और अनुपालन

आईटी एक्ट की धारा 79 प्लेटफॉर्म्स को सेफ हार्बर प्रावधान देती है। इसके तहत उन्हें यूजर-जनरेटेड कंटेंट के लिए सीमित दायित्व मिलता है, बशर्ते वे सरकार या अदालत के निर्देशों का पालन करें। नई तीन घंटे की समयसीमा इस सेफ हार्बर को और अधिक सख्ती से जोड़ती है। यदि कोई प्लेटफॉर्म इस नियम का पालन करने में विफल रहता है, तो उसकी कानूनी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

सरकार का यह कदम डिजिटल स्पेस को सुरक्षित और जिम्मेदार बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे न केवल डीपफेक और भ्रामक सामग्री पर नियंत्रण होगा, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होगा।