मंगला कपूर: एसिड हमले के बाद छह साल अस्पताल, संगीत ने दी नई पहचान

वाराणसी की गलियों में जहां हर कहानी सुरों में ढल जाती है, वहां एक ऐसी शख्सियत का नाम है जिसने दर्द को अपनी तकदीर नहीं बनने दिया। पद्मश्री डॉ. मंगला कपूर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर इंसान का हौसला बुलंद हो, तो कोई भी घाव उसे हरा नहीं सकता। बारह साल की उम्र में एसिड अटैक ने उनका चेहरा तो झुलसा दिया, लेकिन उनकी आवाज को और मजबूत बना दिया। छह साल तक अस्पतालों में बिताने, कई बार आत्महत्या की कोशिश करने और समाज के तानों को सहने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। संगीत उनके लिए केवल एक कला नहीं, बल्कि एक नए जन्म की तरह आया। आज वे लाखों लोगों के लिए प्रेरणा हैं।

बारह साल की उम्र में बदल गई जिंदगी

मंगला कपूर का बचपन वाराणसी के एक सामान्य संयुक्त परिवार में बीता। पिता मामूली वेतन पर नौकरी करते थे, मां गृहिणी थीं। तीन भाई-बहनों में वे इकलौती बेटी थीं। सीमित साधनों के बावजूद घर में प्यार और अनुशासन का माहौल था। लेकिन सातवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान एक रात उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। किसी व्यापारिक विवाद के चलते उन पर एसिड से हमला कर दिया गया। उस समय उनकी उम्र महज बारह साल थी। यह घटना उनके चेहरे और बचपन को जलाकर राख कर गई, लेकिन उनके भीतर के संगीत को नहीं छू पाई।

अस्पताल के छह साल और 37 ऑपरेशन

हमले के बाद उन्हें सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहां सही इलाज नहीं मिल पाया। हालत इतनी गंभीर हो गई कि लोगों ने उनके जीवित रहने की उम्मीद छोड़ दी। कुछ लोगों ने तो माता-पिता को जहर देने की सलाह दे दी। घर में अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू हो गई थीं, लेकिन मंगला ने हार नहीं मानी। पिता उन्हें लेकर एक निजी अस्पताल गए। इसके बाद शुरू हुआ लंबा इलाज, जिसमें छह सालों में 37 ऑपरेशन हुए। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि दो वक्त की रोटी भी मुश्किल हो गई, लेकिन परिवार ने उम्मीद नहीं छोड़ी। इस दौरान मंगला ने कई बार आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन हर बार पिता का साथ उन्हें संभाल लेता था।

समाज के तानों से लड़कर पढ़ाई जारी रखी

अस्पताल में रहते हुए भी पिता ने उनकी पढ़ाई जारी रखी। घर पर शिक्षक बुलाए गए। जब वे पहली बार आठवीं की परीक्षा देने पहुंचीं, तो सहपाठियों के तानों ने उन्हें तोड़ दिया। प्रिंसिपल ने उन्हें अलग कक्षा में बैठाया, लेकिन वे बिना परीक्षा दिए ही लौट आईं। पिता ने फिर हार नहीं मानी और विशेष परीक्षा दिलवाकर उनकी पढ़ाई फिर से शुरू कराई। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को संभाला और पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया।

संगीत बना नई जिंदगी का सहारा

डिप्रेशन गहराने लगा था। डॉक्टरों ने ध्यान भटकाने के लिए कोई शौक अपनाने की सलाह दी। मंगला के पास ईश्वर का दिया हुआ एक अनमोल स्वर था। पिता ने उन्हें संगीत कक्षा में दाखिला दिलाने की कोशिश की, लेकिन शिक्षक ने यह कहकर मना कर दिया कि दूसरे बच्चे असहज होंगे। मां के आग्रह पर आखिरकार उन्हें प्रवेश मिला। संगीत ने उन्हें नया जीवन दिया। मित्रों, शिक्षकों और रियाज ने उनके आत्मविश्वास को फिर से जगाया। वे हर कक्षा में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होती गईं और स्नातक के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय पहुंच गईं।

पुरानी किताबों से पीएचडी तक का सफर

बीएचयू में पढ़ाई के दौरान आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। बस का किराया भी नहीं होता था, इसलिए वे पैदल विश्वविद्यालय जाती थीं। उनके पास सिर्फ दो साड़ियां थीं, जिन्हें धोकर पहनती थीं। किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे, इसलिए वे वरिष्ठ छात्रों की फटी-पुरानी किताबों से पढ़ाई करती थीं। बाद में छात्रवृत्ति मिलने पर उन्होंने अपनी किताबें खरीदीं। इसी संघर्ष के बीच उन्होंने पीएचडी तक की शिक्षा पूरी की। नौकरी की तलाश में कई साक्षात्कार दिए, लेकिन रूप-रंग के कारण बार-बार अस्वीकार कर दी गईं। अंततः बीएचयू के महिला महाविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिली।

बीमारी से लड़कर वापसी

इसी बीच पेजेट बीमारी के कारण उनके दोनों पैरों की हड्डियां टूट गईं। आठ महीने बिस्तर पर रहीं, लेकिन बैशाखी के सहारे वापस कॉलेज लौटीं। तीस साल की सेवा के बाद वे प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुईं। इस दौरान उन्होंने संगीत को केवल प्रस्तुति का माध्यम नहीं बनाया, बल्कि सामाजिक बदलाव का साधन बनाया। उन्होंने वंचित बच्चों के लिए मुफ्त संगीत कक्षाएं शुरू कीं।

पद्मश्री और छह पुस्तकों की लेखिका

भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके असाधारण योगदान और दुर्लभ रागों के संरक्षण के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। साथ ही, संगीत-शास्त्र और राग-दस्तावेजीकरण में उनके काम के लिए आचार्य भरत मुनि पुरस्कार भी दिया गया। उनकी गायकी की गहराई के कारण लोग उन्हें ‘काशी की लता’ कहने लगे। वे छह पुस्तकों की लेखिका हैं। उनकी आत्मकथा ‘सीरत’ उनकी उपलब्धियों का जीवंत दस्तावेज है, जिस पर एक फिल्म भी बनाई गई है।

युवाओं के लिए सीख

  • मानसिक मजबूती शारीरिक मजबूती से कहीं बड़ी होती है।
  • परिस्थितियां नहीं, बल्कि आपका दृष्टिकोण आपका भविष्य तय करता है।
  • समाज के तानों से टूटने के बजाय मजबूत बनें।
  • कला और संगीत जीवन को नई दिशा दे सकते हैं।