होलिका दहन: पूर्णिया के सिकलीगढ़ धरहरा में राजकीय सम्मान के साथ हुआ आयोजन

पूर्णिया जिले के बनमनखी अनुमंडल स्थित सिकलीगढ़ धरहरा गांव को होली पर्व की जन्मस्थली माना जाता है। यहां सोमवार की शाम राजकीय महोत्सव के तहत होलिका दहन किया गया, जिसमें पौराणिक परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला। कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में प्रह्लाद स्तंभ परिसर में लगभग एक लाख श्रद्धालु एकत्रित हुए। मंत्रोच्चार के बीच विशाल होलिका दहन हुआ और आसमान रंग-बिरंगी आतिशबाजी से जगमगा उठा।

देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु

इस आयोजन में पूर्णिया के अलावा पड़ोसी देश नेपाल, झारखंड और पश्चिम बंगाल से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। श्रद्धालु ‘महादहन’ के साक्षी बनने और धुरखेल की परंपरा में शामिल होने के लिए उमड़े। भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए थे। कार्यक्रम स्थल से लगभग डेढ़ किलोमीटर पहले बैरिकेडिंग कर वाहनों को रोक दिया गया था, और महिला व पुरुष श्रद्धालुओं के लिए अलग-अलग कतारें बनाई गई थीं।

मंत्री और विधायक ने किया शुभारंभ

महोत्सव का शुभारंभ बिहार सरकार की खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण मंत्री लेशी सिंह और बनमनखी विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। मंत्री लेशी सिंह ने इसे सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बताया, जबकि विधायक कृष्ण कुमार ऋषि ने सिकलीगढ़ धरहरा के विकास और इसकी ऐतिहासिक महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यहां के कण-कण में भगवान नरसिंह का वास है और पुरातात्विक साक्ष्य इसकी पुष्टि करते हैं।

सांस्कृतिक संध्या में उमड़ी भीड़

धार्मिक अनुष्ठानों के बाद सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसमें भोजपुरी गायक रितेश पांडेय ने प्रस्तुति दी। उनके भक्तिमय गीतों पर बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालु देर रात तक झूमते रहे। आयोजन स्थल पर उत्साह और भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिला।

पौराणिक मान्यताओं से जुड़ी परंपरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, धरहरा की यह भूमि वही स्थान है जहां दैत्य राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका, भक्त प्रह्लाद को अग्नि में जलाने के उद्देश्य से बैठी थी, लेकिन स्वयं भस्म हो गई। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने खंभा फाड़कर नरसिंह रूप में अवतार लिया और हिरण्यकश्यप का वध किया। आज भी यहां होलिका की भस्म से होली खेलने की सदियों पुरानी परंपरा ‘धुरखेल’ के रूप में जीवित है।

परंपरा और आस्था का संगम

इस आयोजन में अबीर-गुलाल के साथ पौराणिक परंपरा की झलक देखने को मिली। श्रद्धालुओं ने राजकीय महोत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और होलिका दहन के बाद एक-दूसरे को रंग लगाकर होली की शुभकामनाएं दीं। यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक था, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने का भी एक प्रयास था।