ईरान का नया डिजिटल दांव: समुद्र के नीचे बिछे इंटरनेट केबल पर टैक्स की तैयारी
दुनिया की तेल आपूर्ति के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जाने वाले हॉर्मुज स्ट्रेट को अब ईरान एक नए ‘डिजिटल हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करने की योजना बना रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान समुद्र के नीचे बिछाई गई इंटरनेट केबलों पर कर लगाने की तैयारी में है। अगर यह कदम उठाया जाता है, तो इसका असर सिर्फ बड़ी टेक कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आम इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की जेब और उनकी इंटरनेट स्पीड दोनों पर पड़ सकता है।
समुद्री इंटरनेट पर नियंत्रण की तैयारी
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर ईरान की पाबंदियों के कारण पहले से ही वैश्विक तेल और गैस की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है। अब ईरान की नजर इसी क्षेत्र में समुद्र के अंदर बिछे इंटरनेट केबलों पर भी है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान इन केबलों पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी कर रहा है और इन्हें कमाई का एक नया स्रोत बनाना चाहता है। इस फैसले से न केवल दुनिया भर में इंटरनेट की गति प्रभावित हो सकती है, बल्कि इंटरनेट पर निर्भर कई डिजिटल सेवाओं पर भी इसका सीधा असर पड़ेगा।
क्या है ‘डिजिटल टोल’ की योजना?
रिपोर्टों के अनुसार, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े मीडिया प्लेटफार्मों ने सरकार से हॉर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाली अंडरसी इंटरनेट केबलों पर ‘डिजिटल टोल’ लगाने की मांग की है। ईरान इन केबलों को ‘हिडन हाईवे’ करार दे रहा है, जहां से हर दिन 10 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के वित्तीय लेन-देन होते हैं।
ईरान का तीन-सूत्रीय डिजिटल प्लान
ईरानी समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों के अनुसार, ईरान ने इस डिजिटल नियंत्रण के लिए तीन बड़े कदम सुझाए हैं:
- पहला कदम: मेटा, अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट और अन्य विदेशी टेक कंपनियों से अंडरसी केबलों के उपयोग के लिए ट्रांजिट टैक्स या वार्षिक टोल वसूला जा सकता है।
- दूसरा कदम: यदि इन कंपनियों का डेटा ईरान के जलक्षेत्र से होकर गुजरता है, तो उन्हें ईरानी कानूनों के तहत काम करना होगा, जिससे डेटा की निगरानी और गोपनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।
- तीसरा कदम: इंटरनेट केबलों की मरम्मत और रखरखाव का पूरा नियंत्रण ईरानी कंपनियों को सौंपा जा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी आशंका जताई गई है कि अगर कुछ दिनों के लिए भी इन केबलों में रुकावट आती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को करोड़ों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ सकता है।
आम इंटरनेट यूजर्स पर क्या होगा असर?
अगर ईरान अपनी इस योजना को लागू करता है, तो इसका असर दुनिया भर के इंटरनेट उपयोगकर्ताओं पर साफ देखा जा सकता है। टेक कंपनियों को इस नए खर्च का बोझ उठाने के लिए अंततः उपयोगकर्ताओं पर ही डालना पड़ेगा। इस स्थिति में गूगल वन, माइक्रोसॉफ्ट 365 और अन्य क्लाउड या सब्सक्रिप्शन सेवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
इसके अलावा, अगर कंपनियां हॉर्मुज स्ट्रेट से डेटा रूट करने से बचना चाहेंगी, तो उन्हें वैकल्पिक और लंबे रास्ते अपनाने होंगे। इससे इंटरनेट लेटेंसी बढ़ सकती है, जिसके परिणामस्वरूप ऑनलाइन गेमिंग में लैग, वीडियो कॉल में देरी और 4K वीडियो स्ट्रीमिंग में रुकावट जैसी समस्याएं आम हो सकती हैं। नेटफ्लिक्स और यूट्यूब जैसी स्ट्रीमिंग सेवाओं का अनुभव भी प्रभावित हो सकता है।
डेटा प्राइवेसी को लेकर बढ़ी चिंता
ईरान का तर्क है कि उसकी समुद्री सीमा से गुजरने वाली केबलों पर उसका कानूनी अधिकार बनता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कंपनियों को स्थानीय कानूनों का पालन करना पड़ा, तो उपयोगकर्ताओं के डेटा की गोपनीयता और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं। यह कदम वैश्विक डेटा सुरक्षा और डिजिटल अधिकारों के लिए एक नई चुनौती पेश कर सकता है।