सावधान: एसिडिटी की दवाएं किडनी और लिवर को पहुंचा सकती हैं गंभीर नुकसान
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी और अनियमित खान-पान ने गैस और एसिडिटी की समस्या को आम बना दिया है। ज्यादा तला-भुना और मसालेदार भोजन करने वाले, देर रात खाना खाने वाले या खाने के तुरंत बाद लेट जाने वाले लोगों को अक्सर सीने में जलन और अपच की शिकायत रहती है।
ऐसे में लोग तुरंत राहत के लिए बिना डॉक्टर की सलाह के ही आम गैस की गोलियां ले लेते हैं। ये दवाएं फौरी आराम तो देती हैं, लेकिन लंबे समय तक इनका सेवन शरीर के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। हाल के अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि एसिडिटी की कुछ आम दवाएं किडनी और लिवर को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
प्रोटॉन पंप इनहिबिटर्स (पीपीआई) क्या हैं?
प्रोटॉन पंप इनहिबिटर्स (पीपीआई) दवाओं का एक ऐसा समूह है जो पेट में एसिड बनाने वाले “प्रोटॉन पंप” को ब्लॉक करता है। ओमेप्राजोल, पैंटोप्राजोल, लैंसोप्राजोल और एसोमेप्राजोल इस श्रेणी की प्रमुख दवाएं हैं। इनका उपयोग गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज (जीईआरडी), पेट के अल्सर, बार-बार होने वाली एसिडिटी और कुछ दवाओं के कारण पेट को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए किया जाता है।
किडनी के लिए कितनी खतरनाक हैं ये दवाएं?
विशेषज्ञों के अनुसार, पीपीआई दवाओं का लंबे समय तक सेवन किडनी के लिए बेहद हानिकारक हो सकता है। एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि इन दवाओं को लगातार लेने से किडनी फेलियर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। ये दवाएं दुनिया भर में सबसे ज्यादा लिखी जाने वाली दवाओं में से एक हैं।
अमेरिका में लगभग 10 प्रतिशत वयस्क हार्टबर्न, एसिड रिफ्लक्स और जीईआरडी जैसी समस्याओं के लिए इन दवाओं का नियमित रूप से उपयोग करते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो के शोधकर्ताओं ने पाया कि पीपीआई दवाएं लेने वाले लोगों में किडनी से जुड़ी बीमारियों का खतरा उन लोगों की तुलना में कहीं अधिक है, जो एसिडिटी के लिए अन्य दवाएं (जैसे हिस्टामिन-2 रिसेप्टर ब्लॉकर) लेते हैं।
अध्ययन में क्या तथ्य सामने आए?
शोध के वरिष्ठ लेखक और फार्मेसी के प्रोफेसर डॉ. रूबेन अबाग्यान के अनुसार, एफडीए के डेटा से पीपीआई दवाओं के गंभीर दुष्प्रभावों का पता चला है, जो सामान्य क्लीनिकल परीक्षणों में नहीं दिखते। क्लीनिकल ट्रायल अक्सर सीमित समय और कम प्रतिभागियों पर आधारित होते हैं, जिससे ये खतरे उजागर नहीं हो पाते।
इस अध्ययन में लगभग 43,000 मरीजों को शामिल किया गया, जो केवल पीपीआई दवाएं ले रहे थे। वहीं, लगभग 8,000 मरीजों का एक अलग समूह बनाया गया, जो केवल एच2 ब्लॉकर दवाएं ले रहे थे। दोनों समूहों में किडनी से जुड़ी समस्याओं का विश्लेषण किया गया।
- पीपीआई लेने वाले 5.6 प्रतिशत मरीजों में किडनी की गंभीर समस्याएं पाई गईं, जबकि एच2 ब्लॉकर लेने वालों में यह आंकड़ा केवल 0.7 प्रतिशत था।
- पीपीआई लेने वालों में क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) का खतरा 28.4 गुना अधिक पाया गया।
- एक्यूट किडनी इंजरी (अचानक किडनी खराब होना) का जोखिम 4.2 गुना बढ़ा हुआ था।
- एंड-स्टेज रीनल डिजीज (किडनी पूरी तरह खराब होना) का खतरा 35.5 गुना अधिक था।
- इसके अलावा, इन दवाओं के सेवन से शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स (सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम) का असंतुलन भी अधिक देखा गया।
लिवर पर भी पड़ता है बुरा असर
किडनी के अलावा, पीपीआई दवाएं लिवर के लिए भी खतरनाक हो सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, ये दवाएं कुछ मरीजों के लिए जरूरी हो सकती हैं, लेकिन शोधकर्ता डॉक्टरों को सलाह देते हैं कि वे इन्हें लिखते समय अधिक सतर्कता बरतें। खासकर उन मरीजों के लिए जिन्हें पहले से किडनी रोग या इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन का खतरा है।
इससे पहले 2017 में प्रकाशित एक अध्ययन में यह संकेत मिले थे कि पीपीआई दवाएं चूहों और इंसानों दोनों में क्रॉनिक लिवर डिजीज के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
रैनिटिडाइन दवाओं का भी खतरा
पीपीआई के अलावा, रैनिटिडाइन जैसी दवाओं को लेकर भी चेतावनी जारी की गई है। रैनिटिडाइन में स्टोर करने पर एन-नाइट्रोसोडाइमिथाइलएमीन (एनडीएमए) नामक एक हानिकारक रसायन बनने लगता है। यह रसायन अत्यधिक विषैला और कैंसर पैदा करने वाला माना जाता है। कई देशों में इस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन भारत में यह अब भी बिना डॉक्टर की सलाह के उपलब्ध है।
विशेषज्ञों का कहना है कि एसिडिटी या गैस की समस्या होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के इन दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए। लंबे समय तक इनका उपयोग करने से पहले डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।