3D-प्रिंटेड घोस्ट गन अब पूरी तरह से अनट्रेसेबल नहीं रहेंगी, वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका
3D-प्रिंटिंग तकनीक ने जहां उद्योग, चिकित्सा और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला दी है, वहीं इसके दुरुपयोग ने एक गंभीर चुनौती भी खड़ी कर दी है। घर पर ही बिना किसी लाइसेंस के हथियार बनाने की सुविधा ने ‘घोस्ट गन’ की समस्या को जन्म दिया है। ये वे हथियार हैं, जिन्हें अब तक बिना पहचान वाला यानी ‘अनट्रेसेबल’ माना जाता था। हालांकि, एक हालिया वैज्ञानिक शोध ने इस धारणा को चुनौती दी है।
क्या है 3D-प्रिंटिंग तकनीक और इसका खतरनाक पहलू?
3D-प्रिंटिंग, जिसे एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग भी कहा जाता है, एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कंप्यूटर पर बनाई गई डिजिटल डिजाइन (CAD फाइल) के आधार पर किसी वस्तु को परत-दर-परत तैयार किया जाता है। इसमें प्लास्टिक, रेजिन या धातु जैसी सामग्री का उपयोग होता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इससे जटिल डिजाइनों को आसानी से और कम सामग्री बर्बाद करके बनाया जा सकता है।
लेकिन इसी तकनीक का इस्तेमाल करके कोई भी व्यक्ति इंटरनेट पर उपलब्ध ब्लूप्रिंट की मदद से एक साधारण 3D प्रिंटर और थोड़ी तकनीकी जानकारी के साथ घर पर ही हथियार बना सकता है। इन हथियारों पर कोई सीरियल नंबर नहीं होता और इन्हें खरीदने के लिए किसी पृष्ठभूमि जांच की आवश्यकता नहीं होती, जिससे ये कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं।
‘घोस्ट गन’ का बढ़ता खतरा और हाइब्रिड हथियार
हाल के वर्षों में दुनिया भर में 3D-प्रिंटेड हथियारों और उनके पुर्जों की बरामदगी के मामले बढ़े हैं। चिंता का विषय यह है कि केवल पूरी तरह से 3D-प्रिंटेड हथियार ही नहीं, बल्कि ‘हाइब्रिड’ हथियार भी बनाए जा रहे हैं। इनमें 3D-प्रिंटेड हिस्सों को बाजार में आसानी से मिलने वाले सामान्य हार्डवेयर पार्ट्स के साथ जोड़कर एक घातक हथियार तैयार किया जाता है। ये हाइब्रिड हथियार मजबूती और मारक क्षमता में पारंपरिक फैक्ट्री-निर्मित हथियारों को टक्कर दे सकते हैं। ऐसे में इन हथियारों के स्रोत का पता लगाना सबसे बड़ी चुनौती बन गया था।
क्या सच में ये हथियार अनट्रेसेबल हैं?
जर्नल फोरेंसिक केमिस्ट्री में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस सवाल का संभावित जवाब दिया है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि 3D-प्रिंटेड हथियार उतने ‘अनट्रेसेबल’ नहीं हैं, जितना अब तक माना जाता था। इस अध्ययन की कुंजी है वह फिलामेंट, यानी वह प्लास्टिक सामग्री जिससे ये हथियार प्रिंट किए जाते हैं। हर फिलामेंट की अपनी एक अलग रासायनिक पहचान होती है, जिसे वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से ट्रेस किया जा सकता है।
3D-प्रिंटिंग फिलामेंट: एक अनोखी रासायनिक पहचान
3D-प्रिंटिंग में इस्तेमाल होने वाले फिलामेंट आमतौर पर विभिन्न प्रकार के पॉलीमर से बने होते हैं। इनमें PLA (पॉलीलैक्टिक एसिड), ABS और PETG सबसे आम हैं।
- PLA: एक बायोप्लास्टिक है जो पर्यावरण के अनुकूल माना जाता है।
- ABS: अपनी मजबूती और टिकाऊपन के लिए जाना जाता है।
- PETG: लचीला और मजबूत होता है, जिसका उपयोग विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के लिए किया जाता है।
हालांकि, कई निर्माता इन बेस प्लास्टिक में अलग-अलग रसायन और एडिटिव्स मिलाते हैं ताकि उत्पाद को अधिक मजबूती, लचीलापन या एक अलग रूप दिया जा सके। दिलचस्प बात यह है कि इन एडिटिव्स की पूरी जानकारी अक्सर पैकेजिंग पर नहीं दी जाती, जो इसे और भी अनोखा बनाती है। यही अनोखी रासायनिक संरचना हर फिलामेंट को एक विशिष्ट ‘केमिकल फिंगरप्रिंट’ प्रदान करती है।
शोध में क्या सामने आया?
शोधकर्ताओं ने इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी नामक एक उन्नत तकनीक का उपयोग करके 60 से अधिक विभिन्न फिलामेंट सैंपलों का गहन विश्लेषण किया। यह तकनीक यह मापती है कि कोई पदार्थ इन्फ्रारेड प्रकाश को किस प्रकार अवशोषित करता है। प्रत्येक फिलामेंट का एक अलग ‘इन्फ्रारेड प्रोफाइल’ होता है, जो उसकी अनूठी रासायनिक संरचना को दर्शाता है।
अध्ययन के नतीजे चौंकाने वाले थे। देखने में बिल्कुल एक जैसे लगने वाले कई फिलामेंट रासायनिक रूप से पूरी तरह से अलग पाए गए। यहां तक कि एक ही प्रकार के पॉलीमर (जैसे PLA) से बने दो अलग-अलग फिलामेंट में भी अलग-अलग एडिटिव्स के कारण स्पष्ट अंतर देखा गया। एक मामले में तो ऐसा एडिटिव पाया गया, जिसका पैकेजिंग पर कोई जिक्र ही नहीं था।
इन निष्कर्षों का सीधा सा मतलब है कि यदि किसी 3D-प्रिंटेड हथियार के साथ उसी फिलामेंट का एक टुकड़ा भी बरामद हो जाता है, तो वैज्ञानिक रूप से दोनों के बीच एक संबंध स्थापित किया जा सकता है। इससे अलग-अलग मामलों में बरामद हथियारों को आपस में जोड़ा जा सकता है और उनकी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) का पता लगाने की संभावना बढ़ जाती है।
आगे की राह: तकनीक से तकनीक का मुकाबला
शोधकर्ता यह स्वीकार करते हैं कि फिलहाल हर एक फिलामेंट को पूरी तरह से अलग पहचानना संभव नहीं है। इसके लिए और अधिक उन्नत तकनीकों की आवश्यकता है। वैज्ञानिक अब फिलामेंट की विस्तृत रासायनिक और तत्वीय संरचना पर काम कर रहे हैं। उनका लक्ष्य एक ऐसा डेटाबेस तैयार करना है, जिसकी मदद से किसी भी बरामद 3D-प्रिंटेड हथियार के ‘केमिकल फिंगरप्रिंट’ के आधार पर यह पता लगाया जा सके कि वह किस सामग्री से और संभवतः किस प्रिंटर से बना है।
यह स्पष्ट है कि जिस तकनीक ने एक नया खतरा पैदा किया है, उसी तकनीक की मदद से उसका समाधान भी खोजा जा रहा है। यदि यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण व्यापक रूप से अपनाया जाता है, तो 3D-प्रिंटेड घोस्ट गन के पीछे छिपना अपराधियों के लिए पहले जितना आसान नहीं रहेगा। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के पास अब एक नया और शक्तिशाली हथियार होगा, जो इन अनियंत्रित हथियारों पर लगाम लगाने में मददगार साबित हो सकता है।