गणगौर व्रत 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, नियम और महत्व
गणगौर का व्रत विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए रखा जाता है। इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती की विधिवत पूजा की जाती है। यह पर्व चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस व्रत के शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व के बारे में।
गणगौर पूजा का शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि 21 मार्च को तड़के 02:31 बजे शुरू होकर रात्रि 11:57 बजे समाप्त होगी। इस आधार पर गणगौर व्रत 21 मार्च को ही रखा जाएगा। इस दिन रवि योग बन रहा है, जो पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा के लिए ब्रह्म मुहूर्त या प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम रहेगा।
- पहला मुहूर्त: प्रातः 04:49 से 05:36 तक
- दूसरा मुहूर्त: प्रातः 07:55 से 09:26 तक
गणगौर पूजा विधि
गणगौर व्रत की पूजा विधि सरल लेकिन श्रद्धापूर्ण होती है। निम्नलिखित चरणों का पालन करें:
- ब्रह्म मुहूर्त में जागकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल को साफ करके लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं।
- मिट्टी या लकड़ी से बनी भगवान शिव (ईसर) और देवी पार्वती (गौरी) की मूर्तियां स्थापित करें।
- एक कलश में गंगाजल भरकर उसके ऊपर गेहूं के ज्वारे रखें।
- माता गौरी को मेहंदी, कुमकुम, चूड़ियां, मंगलसूत्र और नए वस्त्र अर्पित करें।
- षोडशोपचार विधि से पूजा करें, जिसमें जल, अक्षत, फूल, धूप, दीपक, नैवेद्य और फल शामिल हैं।
- अंत में आरती करें, प्रसाद वितरित करें और व्रत का संकल्प पूरा करें।
गणगौर पूजा मंत्र
पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है:
- ॐ ह्रीं गौरीपतये स्वाहा
- कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥
गणगौर पूजा सामग्री
पूजा की तैयारी के लिए निम्नलिखित सामग्री एकत्र करें:
- ईसर-गौरी की मूर्तियां
- चौकी, कलश, तांबे का लोटा
- गंगाजल, हल्दी, कुमकुम, रोली, अक्षत
- फूल, फूलमाला, दूब घास
- सिंदूर, मेहंदी, काजल, चूड़ी, मंगलसूत्र
- दीपक, घी, कपूर, अगरबत्ती
- नैवेद्य के लिए हलवा, पूड़ी, मिठाई, फल (केला, नारियल, सेब)
- पान के पत्ते, सुपारी, लौंग-इलायची
- गेहूं का ज्वारा, गुड़, गेहूं का आटा
- चंदन, रंग-बिरंगे कपड़े, मौली या कलावा
- नारियल, सिक्के
गणगौर व्रत का महत्व
गणगौर का व्रत विवाहित महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से पति की आयु लंबी होती है और वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है। भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा से अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है। यह व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि स्त्री-पुरुष के पवित्र संबंधों को मजबूत करने का भी एक माध्यम है।