इबोला का बढ़ता खतरा: एक महीने में 100 से अधिक मौतें, जानिए क्यों है यह वायरस इतना घातक

अफ्रीकी देशों कांगो और युगांडा में तेजी से फैल रहा इबोला वायरस अब अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। बढ़ती वैश्विक यात्राओं के कारण भारत में भी इस संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। हालांकि देश में अब तक किसी पुष्ट मामले की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विदेश से लौटे कुछ लोगों में संदिग्ध लक्षण देखे गए हैं। जयपुर, हैदराबाद, बेंगलुरु और गुजरात जैसे शहरों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनकी जांच की जा रही है।

संक्रमण के बढ़ते प्रसार को देखते हुए अमेरिका और भारत सहित कई देशों ने हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्वास्थ्य जांच तेज कर दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस ने पहले ही आगाह किया है कि इबोला विशेषज्ञों के अनुमान से भी तेज गति से फैल रहा है। कांगो से मिल रही ताजा जानकारियां इस बात की पुष्टि करती हैं कि पिछले एक महीने में इस वायरस ने भयावह रूप धारण कर लिया है।

कांगो में बढ़ते मामले और मौतों का आंकड़ा

स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, पूर्वी कांगो में इस प्रकोप की घोषणा के बाद से एक महीने से भी कम समय में कम से कम 100 लोगों की जान जा चुकी है। रविवार तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, कुल 550 से अधिक मामलों की पुष्टि हुई है, जिनमें से 101 लोगों की मौत हो चुकी है और केवल 19 लोग ही ठीक हो पाए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि संक्रमण के फैलने की पुष्टि कई हफ्तों की देरी से हुई। इस बीमारी से निपटने में सबसे बड़ी बाधा यह है कि इस वायरस के लिए अब तक कोई प्रमाणित टीका या प्रभावी इलाज मौजूद नहीं है।

यह प्रकोप इबोला के दुर्लभ बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के कारण फैला है। कांगो में पहले भी इबोला के लगभग 16 प्रकोप देखे जा चुके हैं, लेकिन पुराने स्ट्रेन के विपरीत इस नए स्ट्रेन पर नियंत्रण पाना मुश्किल हो रहा है। मौजूदा टीके इस नए स्ट्रेन पर काम नहीं कर रहे, और इस विशेष स्ट्रेन को रोकने के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।

इबोला को इतना खतरनाक क्यों माना जाता है?

इबोला वायरस को लेकर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ विशेष परिस्थितियां इसे अत्यधिक घातक बना देती हैं। इसकी सबसे डरावनी विशेषता इसका संक्रमण और तीव्रता है। यह वायरस शरीर में गंभीर रक्तस्राव, अंगों की विफलता और तेज बुखार जैसी जटिल समस्याएं पैदा कर सकता है। कई बार मरीज को शुरुआती लक्षणों का पता ही नहीं चलता और स्थिति अचानक गंभीर हो जाती है।

  • शरीर पर तेजी से हमला: इबोला वायरस की संक्रमण दर कोरोना जैसे श्वसन वायरस जितनी तेज नहीं है, लेकिन एक बार यह शरीर में प्रवेश कर जाए तो कुछ ही दिनों में पूरे शरीर को प्रभावित करना शुरू कर देता है। शुरुआती लक्षण जैसे बुखार, कमजोरी और सिरदर्द सामान्य फ्लू जैसे लगते हैं, लेकिन वायरस अंदर ही अंदर रक्त वाहिकाओं और अंगों को नुकसान पहुंचाता रहता है। जैसे-जैसे वायरस बढ़ता है, यह शरीर में गंभीर रक्तस्राव और अंगों के काम करना बंद कर देने जैसी स्थिति पैदा कर देता है।
  • उच्च मृत्यु दर: इबोला की सबसे खतरनाक बात इसकी अत्यधिक उच्च मृत्यु दर है। पिछले कई प्रकोपों में देखा गया है कि संक्रमित लोगों में मृत्यु का जोखिम 35 से 50 प्रतिशत तक रहा है। यह वायरस शरीर के पूरे तंत्र — लीवर, किडनी और रक्त प्रणाली — को प्रभावित कर देता है। जब शरीर के महत्वपूर्ण अंग एक साथ काम करना बंद कर देते हैं, तो इलाज बेहद मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि इसे दुनिया के सबसे घातक वायरसों में गिना जाता है।
  • सीमित इलाज और देर से पहचान: इबोला का कोई पुख्ता इलाज नहीं है। कुछ दवाएं और टीके उपलब्ध हैं, लेकिन वे आमतौर पर पुराने स्ट्रेन के खिलाफ ही सुरक्षा देते हैं। सबसे बड़ी चुनौती इसकी शुरुआती पहचान है, क्योंकि इसके लक्षण सामान्य वायरल बुखार जैसे ही होते हैं। कई बार मरीज अस्पताल देर से पहुंचते हैं, जिससे इलाज का असर कम हो जाता है। बुंडीबुग्यो स्ट्रेन के लिए कोई टीका नहीं होने के कारण यह और भी खतरनाक संक्रामक बीमारी बन गई है।

क्या है इबोला से बचाव के उपाय?

इबोला से बचाव के लिए सबसे जरूरी है संक्रमित व्यक्तियों के सीधे संपर्क से बचना। यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के रक्त, शारीरिक तरल पदार्थ या दूषित वस्तुओं के संपर्क में आने से फैलता है। स्वास्थ्य कर्मियों को विशेष सावधानी बरतने की जरूरत है। प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा से बचना और हाथों की स्वच्छता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण उपाय हैं। फिलहाल, वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियां इस प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं, लेकिन टीके और प्रभावी उपचार के अभाव में यह चुनौती बनी हुई है।