इबोला संकट: मामले एक हजार के पार, हजारों संदिग्ध अब भी पहुंच से बाहर

अफ्रीकी देशों में फैला इबोला वायरस का प्रकोप स्वास्थ्य एजेंसियों के लिए लगातार चिंता बढ़ा रहा है। कांगो और यूगांडा से शुरू हुआ यह संक्रमण अब कई अन्य देशों के लिए भी खतरा बनता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय यात्राओं को देखते हुए भारत में भी इबोला को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है। विदेश से आने वाले यात्रियों की हवाई अड्डों पर ही जांच की जा रही है, और संभावित लक्षण वाले मरीजों के लिए आइसोलेशन की व्यवस्था की गई है। हाल ही में दक्षिण सूडान से लौटी एक महिला को केरल के कोट्टायम मेडिकल कॉलेज के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कराया गया था। इससे पहले भी देश में इबोला के संदिग्ध मामले सामने आते रहे हैं।

वैश्विक स्तर पर स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि संक्रमण के एक हजार से अधिक मामलों की पुष्टि हो चुकी है, और सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी हजारों ऐसे लोग हो सकते हैं जिनकी पहचान नहीं हो पाई है।

250 से अधिक मौतें, चुनौतियां बरकरार

अधिकारियों के अनुसार, पूर्वी कांगो में इबोला के मामलों की संख्या 1,003 तक पहुंच गई है, जिसमें 254 मौतें शामिल हैं। संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाना सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। कांगो के स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि 15 मई को इबोला फैलने की घोषणा के बाद से, मुख्य रूप से इतूरी प्रांत में फैले इस संक्रमण से कुल 100 लोग ठीक हो चुके हैं। कम से कम 365 मरीज अभी भी अस्पतालों या आइसोलेशन में हैं।

मंत्रालय ने कहा कि ‘कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग’ (संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों का पता लगाना) स्थानीय अधिकारियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। वे अब तक केवल 55% लोगों तक ही पहुंच पाए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अभी तक इस प्रकोप के ‘पेशेंट जीरो’ (सबसे पहले संक्रमित व्यक्ति) की पहचान नहीं हो पाई है। साथ ही, अभी भी उन 35,000 से अधिक लोगों का पता लगाना बाकी है जो पिछले सप्ताह तक संक्रमित लोगों के संपर्क में आए थे।

विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती

स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, संक्रमितों का सही आंकड़ा पता न चल पाने का बड़ा कारण यह है कि पूर्वी कांगो विद्रोही गुटों की हिंसा से जूझ रहा है। इतूरी में, इस्लामिक स्टेट समर्थित ‘एलाइड डेमोक्रेटिक फोर्स’ के हमलों के कारण कई गांवों तक पहुंचना मुश्किल हो गया है और लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है।

प्रकोप शुरू हुए एक महीने से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अधिकारियों का मानना है कि बचाव और नियंत्रण के प्रयासों की तुलना में संक्रमण की रफ्तार कहीं अधिक है। किसी को भी इसके वास्तविक दायरे का सही अंदाजा नहीं है। ‘अफ्रीका सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन’ के निदेशक-जनरल डॉ. जीन कासेया ने पिछले सप्ताह एक साक्षात्कार में बताया था कि अगर किसी प्रकोप, खासकर इबोला के प्रकोप को नियंत्रित करना है, तो ‘इंडेक्स केस’ (सबसे पहला मामला) के बारे में पता होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित नहीं है कि यह प्रकोप कब शुरू हुआ था।

डब्ल्यूएचओ की चिंता और अमेरिकी योजना

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अधानोम घेब्रेयसस पहले ही कह चुके हैं कि इबोला विशेषज्ञों की सोच से भी तेज गति से फैल रहा है। कांगो में हालात ऐसे हैं कि कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और बीमारी को फैलने से रोकना बहुत मुश्किल हो गया है। स्वास्थ्य अधिकारियों के पास वायरस के ‘बुंडिबुग्यो’ स्ट्रेन से होने वाली बीमारी को सीमित करने के लिए कोई वैक्सीन या इलाज उपलब्ध नहीं है। यह स्ट्रेन दुर्लभ है और 2007 में इसकी खोज के बाद से इसके कारण केवल चार बार प्रकोप फैला है।

इस बीच, अमेरिका ने केन्या में संभावित संक्रमित लोगों को कुछ समय तक अलग रखकर निगरानी करने की एक नई योजना घोषित की है। जो अमेरिकी नागरिक उन इलाकों से लौटेंगे जहां इबोला फैल रहा है, उन्हें अब केन्या भेजकर विशेष रूप से प्रशिक्षित पब्लिक हेल्थ सर्विस और रक्षा विभाग के अधिकारियों की निगरानी में रखा जाएगा।


यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।