चैटजीपीटी पर ‘प्लीज’ और ‘थैंक्यू’ लिखने से क्या सच में बढ़ती है बिजली की खपत?

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक चर्चा जोरों पर है कि चैटजीपीटी जैसे एआई टूल से बात करते समय ‘प्लीज’ और ‘थैंक्यू’ जैसे विनम्र शब्दों का इस्तेमाल करने से अतिरिक्त ऊर्जा खर्च होती है। कुछ लोगों का मानना है कि इससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। लेकिन क्या यह वाकई सच है? आइए इस मिथक के पीछे की सच्चाई को समझते हैं।

यह तर्क दिया जाता है कि अतिरिक्त शब्दों के कारण एआई मॉडल को अधिक प्रोसेसिंग करनी पड़ती है, जिससे बिजली की खपत बढ़ जाती है। ओपनएआई के प्रमुख सैम ऑल्टमैन ने भी यह स्वीकार किया है कि अरबों सवालों के स्तर पर यह लागत बढ़ सकती है। हालांकि, वास्तविकता यह है कि केवल विनम्र शब्दों के कारण पर्यावरण पर कोई बड़ा असर पड़ता है, यह कहना अतिशयोक्ति होगी। कुछ अतिरिक्त शब्दों से होने वाली ऊर्जा खपत, उन विशाल डेटा सेंटरों की तुलना में बहुत ही मामूली है जो चैटजीपीटी जैसे सिस्टम को संचालित करते हैं। फिर भी, यह बहस एक महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा करती है: लोग अब यह समझने लगे हैं कि एआई कोई अमूर्त तकनीक नहीं है, बल्कि इसके पीछे वास्तविक मशीनें, बिजली और संसाधन लगते हैं, जिनका ठोस प्रभाव दुनिया पर पड़ता है।

डेटा सेंटर और बुनियादी ढांचा: असली ऊर्जा लागत

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को चलाने के लिए बड़े-बड़े डेटा सेंटरों की आवश्यकता होती है। इनमें अत्यधिक शक्तिशाली कंप्यूटर लगे होते हैं, जो भारी मात्रा में बिजली की खपत करते हैं। इन मशीनों को ठंडा रखने के लिए लगातार कूलिंग सिस्टम चलाना पड़ता है, जिसमें पानी और ऊर्जा दोनों का उपयोग होता है। यही कारण है कि एआई का सीधा संबंध बिजली, पानी और जमीन जैसे संसाधनों से जुड़ जाता है। जैसे-जैसे एआई का उपयोग बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसका पर्यावरण पर प्रभाव भी बढ़ता जा रहा है। इसलिए असली मुद्दा यह नहीं है कि हम एआई से सवाल पूछते समय कैसे शब्द चुनते हैं, बल्कि यह है कि हम इन प्रणालियों का कितनी बार और कितनी अधिक मात्रा में उपयोग कर रहे हैं।

हर एआई प्रश्न की एक ऊर्जा लागत क्यों होती है?

एआई और हमारी रोजमर्रा की डिजिटल सेवाओं, जैसे वीडियो स्ट्रीमिंग, के बीच एक बुनियादी अंतर है, जिसे समझना आवश्यक है। पारंपरिक सॉफ्टवेयर में जब आप कोई दस्तावेज़ खोलते हैं या वीडियो देखते हैं, तो सिस्टम ज्यादातर पहले से मौजूद डेटा को ही प्रस्तुत करता है। इसमें अधिक नई प्रोसेसिंग नहीं होती, इसलिए ऊर्जा भी कम खर्च होती है। एआई मॉडल के मामले में ऐसा नहीं है। जब आप एआई से कोई प्रश्न पूछते हैं, तो वह हर बार आपके लिए नया उत्तर तैयार करता है। इसे तकनीकी भाषा में ‘इंटरफेरेंस’ कहा जाता है। इसका अर्थ है कि हर प्रश्न पर एआई को फिर से पूरी गणना करनी पड़ती है, जिससे हर बार नई ऊर्जा खर्च होती है। यही कारण है कि एआई सामान्य सॉफ्टवेयर से भिन्न है। यह एक बड़े बुनियादी ढांचे की तरह काम करता है। जितना अधिक उपयोग होगा, उतनी ही अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी।

सिर्फ बिजली ही नहीं, पानी भी एक बड़ा मुद्दा है

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने चेतावनी दी है कि इस दशक के अंत तक डेटा सेंटरों की बिजली की खपत दोगुनी हो सकती है। लेकिन मामला केवल बिजली तक सीमित नहीं है। डेटा सेंटरों में लगे सर्वरों को ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी का उपयोग होता है। इसके अलावा, इन्हें बनाने और चलाने में जमीन और कई प्रकार की अन्य सामग्री भी लगती है। हालांकि एआई सेवाएं पूरी दुनिया में उपयोग की जाती हैं, लेकिन उनका प्रभाव सबसे अधिक स्थानीय स्तर पर दिखाई देता है। जहां डेटा सेंटर स्थापित होते हैं, वहां की बिजली और पानी की आपूर्ति पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

यह मिथक क्यों महत्वपूर्ण है?

न्यूजीलैंड जैसे देशों को ही देख लें, जहां अधिकांश बिजली नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से बनाई जाती है। इसके बावजूद, जब वहां नए डेटा सेंटर बनते हैं, तो स्थानीय बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ जाता है। कारण स्पष्ट है: जो बिजली सर्वर चलाने में उपयोग होती है, वह बिजली किसी अन्य कार्य के लिए उपलब्ध नहीं रहती। इसलिए एआई को केवल एक डिजिटल सुविधा मानने के बजाय, हमें इसे एक ऐसी भौतिक प्रणाली के रूप में देखना चाहिए, जिसे वास्तविक बिजली और संसाधनों की आवश्यकता होती है।

चैटजीपीटी से बात करते समय ‘प्लीज’ और ‘थैंक्यू’ न लिखने का विचार भले ही वैज्ञानिक रूप से बहुत बड़ा प्रभाव न डालता हो, लेकिन यह एक संकेत अवश्य है। इससे पता चलता है कि लोग अब यह समझने लगे हैं कि एआई का भी पर्यावरण पर प्रभाव पड़ता है। इस सोच को गंभीरता से लेना आवश्यक है, ताकि हम यह तय कर सकें कि एआई के बुनियादी ढांचे को हमारी ऊर्जा योजनाओं और समाज के साथ कैसे बेहतर तरीके से जोड़ा जाए। एआई को नकारने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में अत्यधिक लाभदायक साबित हो रहा है। लेकिन किसी भी अन्य उद्योग की तरह इसके भी फायदे और नुकसान हैं। अगर हम एआई को केवल ‘दिखाई न देने वाला सॉफ्टवेयर’ मानेंगे, तो इसकी वास्तविक कीमत और प्रभाव को समझ नहीं पाएंगे।