दिग्विजय सिंह ने तीन-भाषा नीति पर पीएम मोदी को लिखा पत्र, स्थगन की मांग
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखकर सीबीएसई की तीन-भाषा नीति को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने मौजूदा शैक्षणिक सत्र के बीच में कक्षा 9 के छात्रों के लिए इस नीति को अनिवार्य रूप से लागू करने पर आपत्ति जताई है और सरकार से इसके क्रियान्वयन को तुरंत स्थगित करने का आग्रह किया है।
संसद की शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष सिंह ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि बिना पर्याप्त शिक्षकों, उपयुक्त पाठ्यपुस्तकों और संक्रमणकालीन समय के सत्र के मध्य में अचानक इस नीति को लागू करने से शैक्षणिक व्यवस्था में गंभीर व्यवधान उत्पन्न होने की आशंका है। उन्होंने इसे सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली के जल्दबाजी में लागू किए जाने के दौरान उत्पन्न अराजकता जैसा बताया है, जिसने देशभर के लाखों छात्रों को प्रभावित किया था।
दिग्विजय सिंह ने बताया कि उन्होंने अपने पत्र के साथ कक्षा 9 के छात्रों के अभिभावकों से प्राप्त अभ्यावेदन भी संलग्न किए हैं, जो वर्तमान सत्र के बीच में तीन-भाषा नीति के अनिवार्य कार्यान्वयन का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अभिभावकों की शिकायतों और मांगों को पढ़ने के बाद उन्हें लगता है कि उनकी चिंताएं पूरी तरह से सही हैं और इन पर तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, यदि पर्याप्त शिक्षक, किताबें और तैयारी के लिए समय उपलब्ध नहीं होगा, तो सत्र के बीच में इस नीति को लागू करना बड़ी समस्याएं पैदा कर सकता है।
सीबीएसई के फैसले पर उठाए गए सवाल
दिग्विजय सिंह ने सीबीएसई के उस फैसले पर सवाल उठाया है, जिसमें दिसंबर 2025 की बैठक में यह तय किया गया था कि जब तक एनसीईआरटी नई भाषा की किताबें जारी नहीं करता, तब तक स्कूल पुरानी व्यवस्था के अनुसार पढ़ाई जारी रखेंगे। उनका कहना है कि इस स्पष्ट फैसले के बावजूद सीबीएसई ने नई भाषा नीति को लागू करने का निर्देश जारी कर दिया।
सिंह ने बताया कि सीबीएसई ने 15 मई 2026 को जारी एक आदेश में 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 में तीसरी भाषा पढ़ाना अनिवार्य कर दिया है, जबकि एनसीईआरटी ने अभी तक इसके लिए नई किताबें जारी नहीं की हैं। ऐसी स्थिति में स्कूलों को कक्षा 6 की किताबों का उपयोग करने की सलाह दी गई है। उन्होंने कहा कि इससे स्कूलों और छात्रों को भारी परेशानी हो सकती है और उनकी पढ़ाई की योजना गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।
दिग्विजय सिंह की प्रमुख दलीलें
- यह नीति दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्व के राज्यों के छात्रों के लिए अधिक परेशानी पैदा कर सकती है, क्योंकि वहां हिंदी आमतौर पर नहीं बोली जाती।
- कई स्थानीय और आदिवासी भाषाएं सीबीएसई की मान्यता प्राप्त भाषाओं की सूची में शामिल नहीं हैं, जिससे छात्रों के सामने भाषा चुनने की समस्या आ सकती है।
- कई स्कूलों में संस्कृत तीसरी भाषा के रूप में लोकप्रिय है, लेकिन योग्य संस्कृत शिक्षकों और उचित पाठ्यपुस्तकों की गंभीर कमी है।
- संसाधनों की कमी के कारण संस्कृत को बढ़ावा देने का उद्देश्य भी प्रभावित हो सकता है।
नीति को रोकने की मांग
दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी से विशेष रूप से कक्षा 9 के मौजूदा छात्रों के लिए इस नीति को तुरंत रोकने की अपील की है। उन्होंने बताया कि इस मामले पर अदालत में सुनवाई चल रही है और फैसला 15 जुलाई 2026 को आने की संभावना है, जबकि स्कूलों में तीसरी भाषा की पढ़ाई 1 जुलाई 2026 से शुरू होनी है। उनका मानना है कि अदालत के फैसले से पहले इस नीति को लागू करना उचित नहीं होगा।
छात्रों के हित में तुरंत फैसले की अपील
दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी से इस मुद्दे पर जल्द और संवेदनशीलता के साथ विचार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि लाखों छात्रों का शैक्षणिक भविष्य सही और सोच-समझकर लिए गए नीतिगत फैसलों पर निर्भर करता है। सिंह ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने हाल ही में NEET-UG 2026 पेपर लीक मामले को लेकर भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था और NTA की परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों पर श्वेत पत्र जारी करने की मांग की थी।
उन्होंने कहा कि छात्रों का परीक्षा प्रणाली पर भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि 3 मई को हुई NEET-UG 2026 परीक्षा को पेपर लीक के आरोपों के बाद रद्द कर दिया गया था और इसकी जांच CBI कर रही है, जबकि दोबारा परीक्षा 21 जून को आयोजित की जानी है।