यूरोपीय संघ का स्मार्टफोन कंपनियों के खिलाफ नया नियम: ‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ पर लगाम
क्या आपने कभी महसूस किया है कि आपका स्मार्टफोन, जो कभी बेहद तेज़ था, अब धीमा हो गया है? बैटरी अब पहले जितनी देर नहीं चलती और आपको बार-बार चार्जर की तलाश करनी पड़ती है? यह महज़ एक संयोग नहीं, बल्कि कंपनियों की एक सुनियोजित रणनीति हो सकती है। यूरोपीय संघ (ईयू) अब इस प्रवृत्ति को चुनौती देने के लिए तैयार है, जिसका उद्देश्य फोन की उम्र बढ़ाना और उनकी मरम्मत को आसान बनाना है।
क्यों धीमा पड़ जाता है नया स्मार्टफोन?
अक्सर देखा जाता है कि एक नया स्मार्टफोन शुरुआत में बहुत तेज़ चलता है, लेकिन कुछ महीनों या सालों बाद उसकी परफॉरमेंस गिरने लगती है। बैटरी जल्दी खत्म होती है, चार्जिंग बार-बार करनी पड़ती है और कुल मिलाकर अनुभव पहले जैसा नहीं रहता। डिवाइस पूरी तरह से खराब नहीं होता, लेकिन इतना असुविधाजनक ज़रूर हो जाता है कि उपभोक्ता नया फोन खरीदने के बारे में सोचने लगता है। अब तक फोन में इस तरह के बदलाव को सामान्य माना जाता रहा है, लेकिन यूरोपीय संघ के नीति-निर्माताओं का मानना है कि यह पूरी तरह से प्राकृतिक नहीं है।
प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस: कंपनियों की चाल?
‘प्लान्ड ऑब्सोलेसेंस’ का अर्थ है किसी उत्पाद को इस तरह से डिज़ाइन करना कि वह समय के साथ कम उपयोगी होता जाए। डिवाइस अचानक बंद नहीं होते, बल्कि धीरे-धीरे उनका इस्तेमाल करना इतना मुश्किल हो जाता है कि नए की ज़रूरत महसूस होने लगती है। फोन की बैटरी की क्षमता घटने लगती है, सॉफ्टवेयर अपडेट बंद हो जाते हैं और मरम्मत के लिए पार्ट्स ही नहीं मिलते। इसका नतीजा यह होता है कि नया फोन खरीदना एक मजबूरी बन जाता है।
यूरोपीय संघ के आंकड़ों के अनुसार, लोग आमतौर पर 2 से 3 साल में अपने स्मार्टफोन बदल देते हैं। इसमें बैटरी की खराबी, परफॉरमेंस में गिरावट और मरम्मत का खर्च अहम भूमिका निभाते हैं। कई मामलों में फोन काम कर रहा होता है, लेकिन वह उपयोग के लायक नहीं लगता।
बैटरी: सबसे बड़ी समस्या
स्मार्टफोन की बैटरी एक ऐसा पार्ट है, जो समय के साथ खराब होना तय है। 2017 में एक बड़ा विवाद सामने आया था, जब एप्पल ने स्वीकार किया कि वह पुराने iPhones की स्पीड कम कर रहा था, ताकि बैटरी खराब होने पर फोन अचानक बंद न हो। कंपनी ने इसे सुरक्षा से जोड़ा, लेकिन इससे यह साफ हो गया कि बैटरी की हालत सीधे फोन के अनुभव को प्रभावित करती है। इसके बाद बैटरी हेल्थ फीचर शुरू किए गए, लेकिन मूल समस्या अब भी बनी हुई है।
रिमूवेबल बैटरी का सफाया क्यों?
पहले स्मार्टफोन में बैटरी बदलना आसान था, लेकिन अब ज़्यादातर फोन सील्ड डिज़ाइन में आते हैं। इसके पीछे पतले डिज़ाइन, वॉटरप्रूफिंग और बेहतर बिल्ड जैसे कारण दिए जाते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि ऐसे फोन खोलना मुश्किल होता है, मरम्मत महंगी हो जाती है और उपभोक्ता को कंपनी के सर्विस सिस्टम पर निर्भर रहना पड़ता है। उदाहरण के लिए, गूगल के पिक्सेल डिवाइस में बैटरी से जुड़ी समस्याओं की शिकायतें सामने आई थीं, जहां कई मामलों में बैटरी बदलना ही एकमात्र विकल्प बन गया।
मरम्मत से ज़्यादा बदलने पर जोर
आज के स्मार्टफोन बाजार में ऐसा सिस्टम बन गया है, जहां नया फोन खरीदना ज़्यादा आसान लगता है, जबकि मरम्मत करना मुश्किल और महंगा होता है। कंपनियां स्पेयर पार्ट्स, सॉफ्टवेयर और सर्विस पर नियंत्रण रखती हैं, जिससे डिवाइस की उम्र सीमित हो जाती है।
यूरोपीय संघ क्या बदलना चाहता है?
यूरोपीय संघ के नीति-निर्माता इस पूरे ट्रेंड को बदलना चाहते हैं। इसके तहत डिवाइस की डिज़ाइन में बदलाव किए जाएंगे, ताकि वे ज़्यादा टिकाऊ हों और आसानी से मरम्मत की जा सके।
- नए नियमों के तहत बैटरी को ज़्यादा समय तक चलने वाला बनाया जाएगा।
- स्पेयर पार्ट्स लंबे समय तक उपलब्ध रहेंगे।
- सॉफ्टवेयर सपोर्ट को भी बढ़ाया जाएगा।
- थर्ड-पार्टी मरम्मत करने वालों को भी ज़रूरी टूल्स और जानकारी मिल सकेगी।
इन नियमों के लागू होने से पहले ही कुछ कंपनियां बदलाव करने लगी हैं। एप्पल ने नए डिवाइस में बैटरी हटाना थोड़ा आसान किया है, जबकि मरम्मत प्लेटफॉर्म iFixit के स्कोर भी सुधार दिखा रहे हैं। हालांकि, फोल्डेबल फोन जैसे कुछ डिवाइस अभी भी मरम्मत के लिहाज से काफी जटिल हैं।
भारत जैसे बाजारों पर क्या असर होगा?
यूरोपीय संघ के नियम यूरोप तक सीमित हैं, लेकिन उनका असर वैश्विक स्तर पर पड़ सकता है। कंपनियां आमतौर पर अलग-अलग देशों के लिए अलग डिज़ाइन नहीं बनातीं, इसलिए बदलाव दूसरे बाजारों तक भी पहुंच सकते हैं। भारत में भी ‘राइट टू रिपेयर’ और रिपेयरबिलिटी इंडेक्स जैसे कदमों पर काम शुरू हो चुका है, जो भविष्य में बड़े बदलाव ला सकते हैं।