48 वर्ष की आयु में अंतिम चरण का प्रोस्टेट कैंसर, दो वर्षों में पूरी तरह स्वस्थ: कैसे संभव हुआ यह चमत्कार?
कैंसर आज भी दुनिया भर में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। हर वर्ष लगभग एक करोड़ लोग इस गंभीर बीमारी से अपनी जान गंवा देते हैं। चिकित्सा विज्ञान में निरंतर हो रही प्रगति और आधुनिक उपचार पद्धतियों ने कैंसर के इलाज को पहले की तुलना में अधिक प्रभावी बना दिया है। फिर भी, कई क्षेत्रों में प्रारंभिक जांच और उपचार तक पहुंच की कमी के कारण यह बीमारी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।
पुरुषों में फेफड़े और मुंह के कैंसर के मामले सबसे अधिक सामने आते हैं। हाल के वर्षों में प्रोस्टेट कैंसर का खतरा भी तेजी से बढ़ा है। चिकित्सकों के अनुसार, यदि इस कैंसर का समय पर पता चल जाए, तो उपचार न केवल आसान हो जाता है, बल्कि रोगी के बचने की संभावना भी काफी बढ़ जाती है।
प्रोस्टेट कैंसर से जुड़ा एक अद्भुत मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। इसमें 48 वर्ष की आयु में एक व्यक्ति को अंतिम चरण का प्रोस्टेट कैंसर होने का पता चला, लेकिन मात्र दो वर्षों के भीतर वह पूरी तरह से कैंसर-मुक्त हो गया। चिकित्सा जगत में इसे एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। आइए जानते हैं कि यह संभव कैसे हुआ।
अंतिम चरण के प्रोस्टेट कैंसर का पता लगना
प्रोफेसर केविन मॉर्टिमर, जो स्वयं एक डॉक्टर हैं और हजारों रोगियों का इलाज कर चुके हैं, को 48 वर्ष की आयु में एक जांच के दौरान पता चला कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर है और यह पूरे शरीर में फैल चुका है। इसे स्टेज-4 कैंसर माना गया, जिसमें जीवित रहने की संभावना आमतौर पर बहुत कम होती है।
इंग्लैंड के लिवरपूल स्थित एक अस्पताल में रेस्पिरेटरी मेडिसिन के सलाहकार प्रोफेसर मॉर्टिमर कई हफ्तों से पीठ दर्द से परेशान थे। शुरुआत में उन्होंने इसे हाल ही में की गई लंबी यात्रा का प्रभाव समझा। हालांकि, जब दर्द कम नहीं हुआ, तो उन्होंने अपने ही अस्पताल में स्कैन कराया। जांच रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि प्रोस्टेट से शुरू हुआ कैंसर उनके शरीर के कई हिस्सों में फैल चुका था। डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि यह बीमारी पूरी तरह से ठीक नहीं हो सकती और संभवतः उनके पास जीने के लिए केवल कुछ ही साल बचे हैं।
दो वर्षों में ही कैंसर का पूरी तरह से खत्म होना
प्रोफेसर मॉर्टिमर बताते हैं कि यह खबर उनके लिए बेहद डरावनी थी। उन्हें ऐसा लग रहा था जैसे वे जीवन के हर पल को आखिरी बार जी रहे हों। जब उन्होंने यह बात अपनी बेटी को बताई, तो उसका पहला जवाब था, “पिताजी, हमें उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए।”
डॉक्टरों ने उन्हें पैलिएटिव ट्रीटमेंट की सलाह दी, जो बीमारी को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसे नियंत्रित रखने और रोगी की पीड़ा कम करने पर केंद्रित होता है। बीमारी का पता चले हुए अब दो साल बीत चुके हैं। आज वे न केवल जीवित हैं, बल्कि हैरानी की बात यह है कि उनके शरीर में कैंसर का कोई निशान नहीं बचा है। सवाल उठता है कि अंतिम चरण का कैंसर आखिर ठीक कैसे हुआ? इसका उत्तर है – ‘ट्रिपल थेरेपी’।
ट्रिपल थेरेपी: प्रोस्टेट कैंसर के लिए एक क्रांतिकारी उपचार
प्रोस्टेट कैंसर के हर साल 15 लाख से अधिक नए मामले सामने आते हैं, और लगभग 4 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। यह 110 से अधिक देशों में पुरुषों में होने वाला सबसे आम कैंसर है और मुख्य रूप से अधिक उम्र के लोगों को प्रभावित करता है। अधिकांश मामले 65 वर्ष से अधिक आयु के पुरुषों में पाए जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रोफेसर मॉर्टिमर का मामला कोई अकेला चमत्कार नहीं है। वर्ष 2023 से, उन्नत चरण के प्रोस्टेट कैंसर वाले कई रोगियों को ‘ट्रिपल थेरेपी’ दी जा रही है। इस उपचार में तीन प्रकार की चिकित्सा एक साथ की जाती है:
- दो पहले से इस्तेमाल होने वाले उपचार
- एक नई शक्तिशाली हार्मोन दवा “डैरोलुटामाइड”
प्रोस्टेट कैंसर की कोशिकाएं पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन की मदद से बढ़ती हैं। डैरोलुटामाइड नामक दवा कैंसर कोशिकाओं से जुड़ जाती है और टेस्टोस्टेरोन को उन तक पहुंचने से रोकती है, जिससे कैंसर की वृद्धि धीमी हो जाती है या रुक जाती है। इसके साथ ही रोगियों को कीमोथेरेपी भी दी जाती है, जो तेजी से बढ़ने वाली कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने का प्रयास करती है। इसके अलावा, एक और गोली दी जाती है जो शरीर में टेस्टोस्टेरोन के उत्पादन को कम करती है।
उपचार के परिणाम और रोगी की वापसी
प्रोफेसर मॉर्टिमर बताते हैं कि उपचार शुरू होने के बाद शुरुआत में उन्हें इतना तेज दर्द होता था कि चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता था, लेकिन असर बहुत जल्दी दिखने लगा। वे कहते हैं कि हर बार स्कैन कराने पर कैंसर पहले से छोटा दिखाई देता था। उपचार शुरू करने से पहले उनका प्रोस्टेट-विशिष्ट एंटीजन (पीएसए) स्तर 600 से अधिक था, लेकिन कुछ ही महीनों में यह लगभग शून्य के करीब पहुंच गया। पीएसए स्तर का उपयोग प्रोस्टेट कैंसर की पहचान और निगरानी के लिए किया जाता है। मात्र छह महीने बाद, वे फिर से पार्ट-टाइम काम पर लौट आए।
विशेषज्ञों की राय और भविष्य की संभावनाएं
प्रोस्टेट कैंसर यूके की स्वास्थ्य सेवा निदेशक एमी रायलेंस के अनुसार, आंकड़े बताते हैं कि लगभग 45 प्रतिशत पुरुष ट्रिपल थेरेपी पर बहुत अच्छी प्रतिक्रिया देते हैं। शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि भविष्य में कुछ रोगियों को शायद कीमोथेरेपी की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के कैंसर शोधकर्ता प्रोफेसर गर्ट अटार्ड कहते हैं कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस उपचार में कीमोथेरेपी कितना अतिरिक्त लाभ प्रदान करती है। इसलिए, ऐसे परीक्षण चल रहे हैं जिनमें उन्नत प्रोस्टेट कैंसर के रोगियों को बिना कीमोथेरेपी के केवल डैरोलुटामाइड देकर परिणाम देखे जा रहे हैं। वे बताते हैं कि 20 साल पहले जब उन्होंने प्रोस्टेट कैंसर के रोगियों का इलाज शुरू किया था, तब औसतन रोगी केवल दो साल तक जीवित रहते थे। लेकिन अब, डैरोलुटामाइड लेने वाले लगभग 40 प्रतिशत रोगी 12 साल बाद भी स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए हमेशा अपने चिकित्सक से परामर्श लें।