अटेंशन इकोनॉमी का शिकार: क्या सोशल मीडिया युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहा है?
अमेरिका के लॉस एंजिल्स में एक ऐसा मुकदमा चल रहा है, जो पूरी सोशल मीडिया इंडस्ट्री की दिशा बदल सकता है। यह मामला इस बात की जांच कर रहा है कि क्या यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म जानबूझकर युवाओं को अपना आदी बनाकर उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस केस के केंद्र में 20 वर्षीय युवती केजीएम है, जिसने आरोप लगाया है कि बचपन में इन प्लेटफॉर्म्स के अत्यधिक इस्तेमाल ने उसे डिप्रेशन, सेल्फ-हार्म और गंभीर मानसिक बीमारियों की ओर धकेल दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह पहली बार है जब कोई जूरी यह तय करेगी कि सोशल मीडिया कंपनियों ने अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन से जानबूझकर युवाओं को नुकसान पहुंचाया है या नहीं। केजीएम के वकीलों ने अदालत में चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं। उनके अनुसार, केजीएम ने महज 6 साल की उम्र में यूट्यूब और 9 साल की उम्र में इंस्टाग्राम का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। 10 साल की उम्र तक आते-आते वह डिप्रेशन का शिकार हो गई और खुद को नुकसान पहुंचाने लगी। 13 साल की उम्र में थेरेपिस्ट ने उनमें बॉडी डिस्मॉर्फिक डिसऑर्डर और सोशल फोबिया जैसी गंभीर मानसिक समस्याएं पाईं।
अटेंशन इकोनॉमी: कैसे काम करता है यह मॉडल?
वादी पक्ष के वकीलों का तर्क है कि सोशल मीडिया कंपनियों की पूरी बिजनेस मॉडल ‘अटेंशन इकोनॉमी’ पर आधारित है। इसका मतलब है कि ये प्लेटफॉर्म इस तरह से डिजाइन किए जाते हैं कि वे यूजर का ध्यान ज्यादा से ज्यादा समय तक बांधे रख सकें। इसके लिए एल्गोरिद्म और फीचर्स इस तरह बनाए जाते हैं कि यूजर को लगातार स्क्रॉल करने और देखते रहने की आदत पड़ जाए। जितना ज्यादा समय यूजर प्लेटफॉर्म पर बिताएगा, कंपनियों को उतना ही ज्यादा विज्ञापन और मुनाफा होगा।
टेक दिग्गजों की गवाही
इस ऐतिहासिक मुकदमे में दुनिया के सबसे शक्तिशाली टेक लीडर्स को गवाही देने के लिए बुलाया गया। छह सप्ताह तक चले इस ट्रायल में जूरी ने इनके तर्कों को ध्यान से सुना:
- मार्क जुकरबर्ग (मेटा के सीईओ): उनसे प्लेटफॉर्म की सुरक्षा और किशोरों के डेटा के इस्तेमाल पर कड़े सवाल पूछे गए।
- एडम मोसेरी (इंस्टाग्राम हेड): इंस्टाग्राम के एल्गोरिद्म और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव को लेकर उनसे जवाब मांगा गया।
- क्रिस्टोस गुडरो (यूट्यूब के वीपी): यूट्यूब के रिकमेंडेशन इंजन के डिजाइन और उसके परिणामों पर उनसे पूछताछ हुई।
कंपनियों का बचाव
दूसरी तरफ, मेटा और यूट्यूब ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि उनके प्लेटफॉर्म ज्यादातर यूजर्स के लिए सुरक्षित हैं। उनका तर्क है कि केजीएम की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं अन्य व्यक्तिगत और पारिवारिक कारणों से जुड़ी हो सकती हैं, न कि सिर्फ सोशल मीडिया के इस्तेमाल से।
जूरी को क्या तय करना है?
इस मामले में जूरी को दो मुख्य सवालों के जवाब देने हैं:
- क्या सोशल मीडिया कंपनियों ने लापरवाही बरती है?
- क्या उनके प्लेटफॉर्म ने वादी को वास्तविक नुकसान पहुंचाया है?
अगर फैसला वादी के पक्ष में जाता है, तो कंपनियों पर भारी वित्तीय जुर्माना लगाया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा फैसला सोशल मीडिया कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म के डिजाइन और एल्गोरिद्म में बड़े बदलाव करने के लिए मजबूर कर सकता है।
यह सिर्फ एक केस नहीं है
यह मुकदमा सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ चल रहे एक बड़े कानूनी संघर्ष का हिस्सा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले में 1600 से ज्यादा लोग शामिल हैं, जिनमें कई परिवार और स्कूल डिस्ट्रिक्ट्स भी शामिल हैं। इसके अलावा, इस केस में टिकटॉक और स्नैपचैट जैसे अन्य प्लेटफॉर्म भी शामिल किए गए हैं।
क्या बदल सकता है फैसले के बाद?
बताया जा रहा है कि शुक्रवार से जूरी की चर्चा शुरू हो सकती है। यह फैसला तय करेगा कि भविष्य में सोशल मीडिया कंपनियां अपने एडिक्टिव डिजाइन के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार मानी जाएंगी या नहीं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस केस का नतीजा भविष्य में सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी तय करने में एक मिसाल बन सकता है।
अगर अदालत कंपनियों को जिम्मेदार मानती है, तो इससे सोशल मीडिया एल्गोरिद्म, बच्चों के लिए सुरक्षा नियम और डिजिटल प्लेटफॉर्म डिजाइन में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। पूरी टेक इंडस्ट्री की नजर इस ऐतिहासिक फैसले पर टिकी हुई है, जो आने वाले समय में डिजिटल दुनिया के नियमों को पूरी तरह से बदल सकता है।