भारतीय भाषाओं की अमिट शक्ति: शिक्षा मंत्री ने 55 भाषाओं में किताबों का किया विमोचन

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल ही में दिल्ली स्थित कौशल भवन में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लिया, जहां उन्होंने भारतीय भाषा समिति द्वारा 55 विभिन्न भारतीय भाषाओं में प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन किया। यह आयोजन भारत की भाषाई विविधता को सशक्त बनाने और संरक्षित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

भाषाएं हैं एकता का सूत्र

इस अवसर पर अपने संबोधन में मंत्री प्रधान ने कहा कि भारतीय भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक एकता की मजबूत नींव हैं। उन्होंने बताया कि इतिहास में कई बार भारतीय भाषाओं को कमजोर करने के प्रयास हुए, लेकिन ये भाषाएं हर बार समय की कसौटी पर खरी उतरीं। आज भी ये हमारी सभ्यता और ज्ञान परंपरा का अभिन्न अंग बनी हुई हैं।

मंत्री ने औपनिवेशिक काल की मैकाले मानसिकता की तुलना भारतीय दृष्टिकोण से करते हुए कहा कि हमारी सभ्यता ने हमेशा भाषाओं को विभाजन का नहीं, बल्कि संवाद और सांस्कृतिक सद्भाव का सेतु माना है। यही कारण है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं में शिक्षा के दृष्टिकोण को विशेष रूप से बढ़ावा देती है।

प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाषाई उत्थान

शिक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय भाषाओं को मिल रहे समर्थन का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अनुसूचित सूची में अधिक भाषाओं को शामिल करने से लेकर शास्त्रीय ग्रंथों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद और मातृभाषा में पढ़ाई के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। उनके अनुसार, सभी भारतीय भाषाएं राष्ट्रीय भाषाएं हैं और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।

55 पुस्तकों का विशेष संग्रह

इस अवसर पर विमोचित 55 साहित्यिक कृतियों में विविधता देखने को मिली। इनमें केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल) के शास्त्रीय भाषा उत्कृष्टता केंद्रों द्वारा तैयार 41 पुस्तकें शामिल हैं। इसके अलावा, केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान (सीआईसीटी) द्वारा प्रकाशित 13 पुस्तकें और तिरुक्कुरल सांकेतिक भाषा श्रृंखला भी इस संग्रह का हिस्सा हैं।

भारत, जो लोकतंत्र की जननी और भाषाई विविधता से समृद्ध देश है, में यह समाज का दायित्व है कि वह राष्ट्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संपदा का संरक्षण करे। इस पहल का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को इस समृद्ध विरासत के प्रति जागरूक करना और उन्हें अपनी मातृभाषा में ज्ञान प्राप्त करने का अवसर प्रदान करना है।