JEE Exam 2025: दिल्ली हाईकोर्ट ने एकल न्यायाधीश के आदेश को बरकरार रखा, याचिका खारिज
दिल्ली उच्च न्यायालय ने जेईई परीक्षा 2025 से जुड़े विवाद में अपना अंतिम रुख स्पष्ट कर दिया है। खंडपीठ ने राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) के खिलाफ दायर रिट याचिका को खारिज करने वाले एकल न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखा है। यह मामला दो जेईई उम्मीदवारों द्वारा दायर किया गया था, जिन्होंने 2025 की प्रवेश परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं में अनियमितताओं का आरोप लगाया था।
खंडपीठ का फैसला और जुर्माने में संशोधन
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए एकल न्यायाधीश के 22 सितंबर के आदेश को सही ठहराया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत उत्तर पत्र वास्तविक नहीं पाए गए। हालांकि, अदालत ने दोनों याचिकाकर्ताओं पर लगाए गए आर्थिक जुर्माने के आदेश में संशोधन किया। पहले प्रत्येक पर 30,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया था, जिसे बदलकर एक महीने की सामुदायिक सेवा करने का निर्देश दिया गया।
सामुदायिक सेवा का आदेश
22 दिसंबर के आदेश के अनुसार, पहले अपीलकर्ता को 15 मई से 15 जून तक एक महीने के लिए वृद्धाश्रम में सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच सेवा करने का निर्देश दिया गया है। दूसरे अपीलकर्ता को गाजियाबाद स्थित एक बाल देखभाल केंद्र में समान अवधि के लिए सामुदायिक सेवा करनी होगी। यह आदेश राष्ट्रीय साइबर फोरेंसिक प्रयोगशाला (NFCL) की रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें पाया गया कि कथित स्कोरकार्ड डाउनलोड करने के समय से संबंधित ब्राउजर लॉग अपीलकर्ताओं के उपकरणों से गायब थे।
अदालत ने छात्रों के दावों को खारिज किया
पीठ ने स्पष्ट किया कि उन्हें एकल न्यायाधीश द्वारा दिए गए तर्कों या निष्कर्षों में कोई खामी नहीं मिली। अदालत ने छात्रों के दावों को “गणितीय रूप से असंगत और स्थापित परीक्षा प्रक्रियाओं के विपरीत” बताया। पीठ ने यह भी कहा कि उठाए गए मुद्दे तथ्यों के विवादित प्रश्नों और हेरफेर के आरोपों से संबंधित थे, जिनका संवैधानिक न्यायालय अपने रिट क्षेत्राधिकार में निर्णय नहीं कर सकता।
प्रतिबंध पर स्पष्टीकरण
अदालत ने एनटीए के वकील की इस दलील पर ध्यान दिया कि दोनों उम्मीदवारों को 2025 और 2026 की जेईई परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया गया है, लेकिन उन्हें किसी अन्य परीक्षा में भाग लेने से नहीं रोका गया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रतिबंध को उनके भविष्य के शैक्षणिक प्रयासों के लिए कलंक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह आदेश सुनिश्चित करता है कि छात्रों के करियर पर इसका कोई स्थायी नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला जेईई 2025 परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाओं में कथित अनियमितताओं से जुड़ा था। छात्रों ने आरोप लगाया था कि उनके उत्तर पत्रों के साथ छेड़छाड़ की गई, जिसके कारण उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। एकल न्यायाधीश ने फोरेंसिक जांच के बाद इन दावों को निराधार पाया और याचिका खारिज कर दी। खंडपीठ ने भी इस फैसले से सहमति जताई और कहा कि छात्रों द्वारा प्रस्तुत सबूत विश्वसनीय नहीं थे।
- अदालत ने याचिकाकर्ताओं के दावों को तथ्यात्मक रूप से कमजोर पाया।
- फोरेंसिक रिपोर्ट में ब्राउजर लॉग की अनुपस्थिति को महत्वपूर्ण माना गया।
- सामुदायिक सेवा का आदेश छात्रों को सुधार का अवसर देने के लिए दिया गया।
- प्रतिबंध को भविष्य में शैक्षणिक अवसरों में बाधा न बनने देने का आश्वासन दिया गया।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला जेईई परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और फोरेंसिक साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस सबूतों के परीक्षा एजेंसी के खिलाफ दावे नहीं चल सकते। साथ ही, छात्रों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए उन्हें सामुदायिक सेवा के माध्यम से सीखने का मौका दिया गया।