मृत्यु के बाद भी सुरक्षित रह सकता है दिमाग: क्या अमरता की ओर बढ़ रहा है विज्ञान?
एक ऐसी दुनिया की कल्पना करें जहां किसी व्यक्ति की सांसें थम जाने, दिल का धड़कना बंद हो जाने और चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित कर दिए जाने के बाद भी उसके अस्तित्व को संरक्षित किया जा सके। यह विचार किसी विज्ञान कथा फिल्म की तरह लग सकता है, लेकिन अमेरिका की एक स्टार्टअप कंपनी इसी अवधारणा को वास्तविकता में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास कर रही है। मृत्यु को चुनौती देने वाली यह पहेली, जिसे चिकित्सा विज्ञान अब तक हल नहीं कर पाया है, अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है।
एक अमेरिकी स्टार्टअप कंपनी का दावा है कि मृत्यु के बाद भी मानव मस्तिष्क की अत्यंत जटिल संरचनाओं को बिना किसी क्षति के संरक्षित किया जा सकता है, बशर्ते यह प्रक्रिया सही समय पर शुरू कर दी जाए। यह किसी व्यक्ति की यादों, व्यक्तित्व और समग्र अस्तित्व को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ी पहल हो सकती है, जो अमरता की ओर पहला कदम साबित हो सकती है।
सुअर के मस्तिष्क को संरक्षित करने में सफलता
वैज्ञानिकों ने हाल ही में एक सुअर के मस्तिष्क को इस तरह से संरक्षित करने में सफलता प्राप्त की है। यह पहली बार है जब किसी स्तनधारी प्राणी के मस्तिष्क को मृत्यु के बाद इस प्रकार संरक्षित किया गया है कि उसकी सूक्ष्म कोशिकीय संरचना लगभग बिना किसी क्षति के बरकरार रही। इस प्रयोग को अंजाम देने वाली कंपनी ‘नेक्टोम’ अब इसी तकनीक को मनुष्यों पर लागू करने की योजना बना रही है।
सुअर को इस प्रयोग के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि उनका मस्तिष्क और रक्त संचार तंत्र मनुष्यों से काफी मिलता-जुलता माना जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक किसी व्यक्ति को पुनर्जीवित करने का प्रमाण नहीं है, बल्कि इसे मस्तिष्क संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए।
‘कनेक्टोम’ को बचाने की कोशिश
यह पूरा प्रयास ‘कनेक्टोम’ नामक एक अवधारणा पर आधारित है। कनेक्टोम मस्तिष्क में मौजूद न्यूरॉन्स और उनके बीच बने संपर्कों के विशाल नेटवर्क को कहा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि किसी व्यक्ति की यादें, व्यक्तित्व और सोचने-समझने की प्रक्रियाएं इसी जटिल नेटवर्क में संग्रहीत होती हैं। यदि इस नेटवर्क को सुरक्षित रखा जा सके, तो सैद्धांतिक रूप से किसी व्यक्ति के मानसिक अस्तित्व से जुड़ी सभी जानकारियों को संरक्षित किया जा सकता है।
इस शोध के कई संभावित लाभ हैं:
- मस्तिष्क का विस्तृत मानचित्रण: यदि मृत्यु के बाद मस्तिष्क को सुरक्षित रखा जा सके, तो भविष्य में मानव मस्तिष्क का अधिक सूक्ष्म और विस्तृत मानचित्र बनाना संभव होगा।
- जटिल प्रक्रियाओं को समझना: इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि यादें, व्यक्तित्व, निर्णय लेने की क्षमता और चेतना जैसी जटिल प्रक्रियाएं मस्तिष्क में कैसे काम करती हैं और कहां संग्रहीत होती हैं।
- बीमारियों का अध्ययन: संरक्षित मस्तिष्कों के अध्ययन से अल्जाइमर, पार्किंसंस और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है और उनके इलाज के नए रास्ते खोजे जा सकते हैं।
संरक्षण की प्रक्रिया कैसे काम करती है?
कंपनी नेक्टोम द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है। सुअर की मृत्यु के लगभग 10 मिनट बाद, वैज्ञानिकों ने दिल के जरिए एक ट्यूब डाली और शरीर से सारा खून बाहर निकाल दिया। इसके बाद, मस्तिष्क में ऐसे विशेष रसायन पहुंचाए गए जो कोशिकाओं और प्रोटीनों को उसी अवस्था में स्थिर कर देते हैं, जिससे उनकी संरचना खराब नहीं होती।
इसके बाद मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का तरल पदार्थ डाला गया, जो दिमाग के अंदर मौजूद पानी की जगह ले लेता है। यह तरल पदार्थ संरक्षण प्रक्रिया के दौरान बर्फ के क्रिस्टल बनने से रोकने में भी मदद करता है, जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। अंत में, मस्तिष्क का तापमान घटाकर लगभग -32 डिग्री सेल्सियस कर दिया गया। इस तापमान पर ऊतक सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि यह प्रक्रिया मृत्यु के 10 से 14 मिनट के भीतर शुरू कर दी जाए, तो कोशिकाओं को होने वाली क्षति को काफी हद तक रोका जा सकता है। माइक्रोस्कोप से जांच करने पर पता चला कि न्यूरॉन्स, उनके बीच के संबंध और उन्हें जोड़ने वाले अणु बहुत अच्छी स्थिति में सुरक्षित थे। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मृत्यु के बाद कोशिकाओं के अंदर मौजूद एंजाइम ऊतकों को तोड़ना शुरू कर देते हैं, इसलिए समय पर कार्रवाई अत्यंत आवश्यक है।
वैज्ञानिकों की राय और आगे की चुनौतियां
वैज्ञानिकों का मानना है कि मस्तिष्क की इस ‘वायरिंग’ को सुरक्षित रखकर किसी व्यक्ति की मानसिक पहचान को लंबे समय तक संरक्षित किया जा सकता है। हालांकि, एक बड़ी बाधा यह है कि वर्तमान तकनीक इतनी उन्नत नहीं है कि सुरक्षित रखे गए मस्तिष्क से किसी व्यक्ति की चेतना या यादों को दोबारा पढ़ा या पुनर्जीवित किया जा सके।
इस चुनौती की गंभीरता को इस बात से समझा जा सकता है कि चूहे के मस्तिष्क के एक छोटे से हिस्से का कनेक्टोम मैप तैयार करने में वैज्ञानिकों को लगभग 7 साल लग गए थे। मानव मस्तिष्क उससे लगभग 1000 गुना अधिक बड़ा और जटिल है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह कोई चिकित्सा पद्धति नहीं है, बल्कि एक रासायनिक संरक्षण प्रक्रिया है। मस्तिष्क की संरचना भले ही सुरक्षित रह जाए, लेकिन वह जैविक रूप से मृत ही रहेगा। कुछ वैज्ञानिक यह नैतिक प्रश्न भी उठाते हैं कि यदि भविष्य में मस्तिष्क की पूरी जानकारी निकालकर किसी व्यक्ति की एक प्रतिकृति बनाई भी जाती है, तो क्या वह वास्तव में वही व्यक्ति होगा या सिर्फ उसकी एक नकल?
दूसरे शब्दों में, मस्तिष्क की संरचना को सुरक्षित कर लेना और उसके काम करने की क्षमता को वापस लाना, ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। फिलहाल यह तकनीक किसी को दोबारा जीवित करने का दावा नहीं करती, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर देती है कि दिल के रुकने के साथ ही मस्तिष्क की सारी जानकारी तुरंत नष्ट नहीं हो जाती। सही समय पर सही प्रक्रिया अपनाकर इसे संरक्षित किया जा सकता है। यदि भविष्य में मानव मस्तिष्क को भी इसी तरह सुरक्षित रखा जाने लगे, तो यह विज्ञान के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी, भले ही यह अमरता के सपने को पूरा करने में अभी कितना भी समय ले।