IGIMS में परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक: शैक्षणिक प्रणाली पर उठे सवाल, छात्रों में रोष
पटना के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में एमबीबीएस और पीजी की अंतिम परीक्षाओं से पहले प्रश्नपत्र लीक होने का गंभीर मामला सामने आया है। इस घटना ने न केवल संस्थान की परीक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि छात्रों में भारी आक्रोश और अविश्वास का माहौल भी पैदा कर दिया है। आरोप है कि परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र कुछ छात्रों तक पहुंचा दिए गए, जिससे निष्पक्ष परीक्षा की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
गोपनीय ईमेल से हुआ खुलासा
यह पूरा मामला 11 मार्च को तब उजागर हुआ जब संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे कुमार को एक गुमनाम ईमेल प्राप्त हुआ। इस ईमेल में डीन परीक्षा कार्यालय के एक गैर-शिक्षण कर्मचारी पर कुछ छात्रों के साथ मिलीभगत करके उन्हें अनुचित लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया गया था। ईमेल में स्पष्ट रूप से परीक्षा प्रणाली में धांधली की बात कही गई थी। हालांकि, इस गंभीर आरोप के बाद भी प्रारंभिक स्तर पर आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
डीन का इस्तीफा और प्रशासनिक हलचल
आरोपियों पर कार्रवाई न होने से नाराज डीन डॉ. प्रकाश दूबे ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह कदम संस्थान के भीतर बढ़ते तनाव और मामले की गंभीरता को दर्शाता है। डॉ. दूबे के इस्तीफे के बाद 2 अप्रैल को डॉ. नीरू गोयल को नया डीन नियुक्त किया गया। इसके बाद 7 अप्रैल को मामले की समीक्षा के लिए एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई, लेकिन संस्थान के निदेशक डॉ. बिंदे कुमार इस बैठक में शामिल नहीं हुए, जिससे मामले को लेकर और भी सवाल उठने लगे हैं।
जांच में सामने आई हेराफेरी
मामले की गहन जांच के बाद 17 मार्च को डीन, एसोसिएट डीन और रजिस्ट्रार की उपस्थिति में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई। इस बैठक में जांच की रिपोर्ट पेश की गई, जिसने पूरे मामले की पोल खोल दी। जांच में पाया गया कि एमबीबीएस 2025 की परीक्षा के सीलबंद पैकेटों को खोला गया और उनमें हेरफेर किया गया। इसके अलावा, उत्तर पुस्तिकाओं, कोडेड लीफलेट्स और उपस्थिति पत्रिकाओं में भी बड़ी विसंगतियां पाई गईं, जो स्पष्ट रूप से जालसाजी की ओर इशारा करती हैं। यह जांच रिपोर्ट संस्थान की परीक्षा प्रक्रिया में बड़ी खामियों को उजागर करती है।
डर का माहौल और छात्रों की चुप्पी
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक पहलू छात्रों का डर और उनकी चुप्पी है। अधिकांश छात्र इस मामले पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर उन्होंने इस पर खुलकर बात की तो उन्हें निशाना बनाया जा सकता है। हालांकि, अंदर ही अंदर छात्रों में भारी नाराजगी है। नाम न छापने की शर्त पर कुछ छात्रों ने बताया कि केवल प्रभावशाली और बड़े लोगों के बच्चों को बचाने के लिए मुख्य आरोपियों पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। छात्रों का आरोप है कि इस मामले में लगभग 40 से 50 छात्र शामिल हैं, लेकिन प्रशासन मामले को दबाने में लगा हुआ है।
- छात्रों का कहना है कि मामले की जांच किसी बाहरी और स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए।
- उनकी मांग है कि जांच में शामिल छात्रों और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों दोनों के खिलाफ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई हो।
- छात्रों का मानना है कि बाहरी जांच से ही सच्चाई सामने आ सकेगी और पारदर्शिता स्थापित हो सकेगी।
इस घटना ने IGIMS जैसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान की छवि को धूमिल किया है। परीक्षा प्रणाली में इस तरह की धांधली से न केवल मेहनती छात्रों के भविष्य पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया है। अब सबकी निगाहें संस्थान प्रशासन और उच्च अधिकारियों के रुख पर टिकी हैं कि वे इस मामले में कितनी निष्पक्षता और सख्ती से पेश आते हैं।