एआई-निर्मित विज्ञापनों पर एएससीआई का सख्त रुख: डीपफेक और भ्रामक दावों पर लगाम
विज्ञापन जगत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, लेकिन अब उपभोक्ताओं को गुमराह करना आसान नहीं होगा। भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) ने विज्ञापनों में एआई के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए एक मसौदा तैयार किया है। इन प्रस्तावित दिशा-निर्देशों का मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता सुनिश्चित करना और उपभोक्ताओं को धोखाधड़ी से बचाना है।
नए नियमों का उद्देश्य और पृष्ठभूमि
एएससीआई ने मंगलवार को विज्ञापनों में एआई द्वारा तैयार सामग्री के लिए ये नए मसौदा दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ये नियम खासतौर पर ‘सिंथेटिक’ या कृत्रिम रूप से निर्मित जानकारी पर केंद्रित हैं। इन्हें सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के संशोधित नियमों (2026) के अनुरूप बनाया गया है। इस पहल का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि विज्ञापन पारदर्शी हों, लेकिन साथ ही उपभोक्ताओं पर अत्यधिक चेतावनियों का बोझ भी न डाला जाए। फिलहाल ये नियम सार्वजनिक सुझावों के लिए खुले हैं, और इच्छुक व्यक्ति 13 जून तक अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
जोखिम के आधार पर तीन श्रेणियां
एएससीआई ने विज्ञापनों को उनके संभावित जोखिम के स्तर के अनुसार तीन श्रेणियों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा है:
- उच्च जोखिम (हाई रिस्क): इस श्रेणी में आने वाले विज्ञापनों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया गया है।
- मध्यम जोखिम (मीडियम रिस्क): ऐसे विज्ञापनों पर यह स्पष्ट रूप से लिखना अनिवार्य होगा कि उनमें एआई का उपयोग किया गया है।
- कम जोखिम (लो रिस्क): इस श्रेणी के विज्ञापनों के लिए किसी भी प्रकार के लेबल या चेतावनी की आवश्यकता नहीं होगी।
एएससीआई के अनुसार, एआई का उपयोग तब भ्रामक माना जाएगा जब वह ऐसी उम्मीदें जगाए जो पूरी न हो सकें, किसी कमजोर वर्ग का शोषण करे, या बिना अनुमति के किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करे।
उच्च जोखिम वाले विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध
उच्च जोखिम वाली श्रेणी में उन विज्ञापनों को रखा गया है जो गैर-कानूनी हैं या किसी के अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। इसमें झूठे दावे करने वाले या एएससीआई की आचार संहिता का उल्लंघन करने वाले विज्ञापन शामिल हैं। खास बात यह है कि भले ही कोई कंपनी इन विज्ञापनों पर एआई का लेबल लगा दे, फिर भी उन्हें नियमों का उल्लंघन माना जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि कोई कंपनी किसी प्रसिद्ध व्यक्ति की झूठी गवाही दिखाती है, उत्पादों की विशेषताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है, या डीपफेक तकनीक का सहारा लेती है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
लेबल अनिवार्यता: मध्यम जोखिम वाले विज्ञापन
मध्यम जोखिम वाले विज्ञापनों के लिए लेबल लगाना अनिवार्य कर दिया गया है। ये वे विज्ञापन हैं जहां एआई का उपयोग सीधे तौर पर उपभोक्ता के फैसले को प्रभावित कर सकता है। यदि इन विज्ञापनों में यह खुलासा नहीं किया गया कि सामग्री एआई द्वारा तैयार की गई है, तो इसे धोखाधड़ी माना जाएगा।
उदाहरण के तौर पर, यदि कोई कंपनी वर्चुअल इन्फ्लुएंसर का उपयोग करती है या किसी वास्तविक व्यक्ति की आवाज और चेहरे को उसकी सहमति के बाद भी बदलती है, तो उसे विज्ञापन में स्पष्ट रूप से बताना होगा। इससे उपभोक्ता समझ पाएंगे कि वे जो देख रहे हैं वह वास्तविक है या डिजिटल रूप से निर्मित।
हल्के बदलावों के लिए छूट
कम जोखिम वाली श्रेणी में उन बदलावों को रखा गया है जिनका उपभोक्ता के फैसले पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसे विज्ञापनों के लिए किसी भी प्रकार के खुलासे या लेबल की आवश्यकता नहीं होगी। इसमें सामान्य एडिटिंग शामिल है, जैसे कि रंगों को ठीक करना, फोटो से अनचाहा शोर कम करना, चेहरे के दाग-धब्बे हटाना, या लाइटिंग में हल्का बदलाव करना।
इसके अलावा, यदि विज्ञापन के बैकग्राउंड में एआई द्वारा बनाई गई सजावटी चीजें, संगीत या धुन का उपयोग किया गया है, तो उनके लिए भी लेबल लगाने की आवश्यकता नहीं होगी। ये नियम सुनिश्चित करते हैं कि विज्ञापन की रचनात्मकता पर प्रभाव न पड़े और उपभोक्ताओं का भरोसा भी बना रहे।