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जोड़ों के दर्द से राहत: घुटने बदलवाए बिना भी संभव है आराम, जानिए नई तकनीक के बारे में
एक समय था जब जोड़ों और हड्डियों का दर्द केवल बुजुर्गों की समस्या मानी जाती थी, लेकिन आज के समय में यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। 25 से 40 वर्ष के युवा भी घुटनों में दर्द, सूजन और अकड़न की शिकायत लेकर डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं। लंबे समय तक लैपटॉप पर काम करना, मोबाइल का अधिक उपयोग, शारीरिक सक्रियता में कमी, बढ़ता वजन, अनियमित खान-पान और विटामिन-डी व कैल्शियम की कमी ने इस बीमारी के खतरे को काफी बढ़ा दिया है। क्या आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं?
अर्थराइटिस की शुरुआत अक्सर हल्के दर्द से होती है, जिसे लोग सामान्य थकान या अधिक काम करने का नतीजा समझकर पेनकिलर लेते रहते हैं। लेकिन धीरे-धीरे जोड़ों में सूजन बढ़ने लगती है और चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है। अगर समय पर सही जांच और इलाज न मिले, तो यह बीमारी जोड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती है और जीवन की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। ऐसे में परेशान लोगों के लिए एक अच्छी खबर है। विशेषज्ञों ने एक ऐसी तकनीक के बारे में बताया है जो सूजन पैदा करने वाली रक्त वाहिकाओं को बंद करके जोड़ों की समस्या को कम करने में मददगार हो सकती है।
अर्थराइटिस का बढ़ता खतरा और आधुनिक इलाज
पिछले कुछ वर्षों में अर्थराइटिस के इलाज में कई नई प्रगति हुई हैं। आधुनिक बायोलॉजिक दवाएं, टारगेटेड थेरेपी, एडवांस फिजियोथेरेपी और बेहतर जॉइंट रिप्लेसमेंट तकनीक ने उन मरीजों के लिए भी उम्मीद जगाई है, जिन्हें पारंपरिक इलाज से पर्याप्त आराम नहीं मिल पा रहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए और सही समय पर उपचार शुरू किया जाए, तो जोड़ों को गंभीर नुकसान से बचाया जा सकता है और मरीज लंबे समय तक सामान्य जीवन जी सकता है।
वैज्ञानिकों ने अर्थराइटिस से पीड़ित लोगों के लिए जिस तकनीक को कारगर बताया है, उसे ‘जेनिक्युलर आर्टरी एम्बोलाइजेशन’ (जीएई) नाम दिया गया है। यह एक नई चिकित्सा पद्धति है जो ऑस्टियोआर्थराइटिस से जूझ रहे लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभर रही है।
क्या है जेनिक्युलर आर्टरी एम्बोलाइजेशन (जीएई)?
यह तकनीक उन मरीजों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है जो दवाओं, फिजियोथेरेपी और इंजेक्शन जैसे पारंपरिक उपचारों से पर्याप्त राहत नहीं पा रहे हैं। सामान्य तरीके से राहत न मिलने वाले या फिर जो लोग घुटने बदलवाने जैसी बड़ी सर्जरी कराने के लिए तैयार नहीं हैं, उनके लिए यह कारगर हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जीएई प्रक्रिया घुटने के अंदर होने वाली सूजन को कम करके दर्द में उल्लेखनीय राहत दे सकती है और कई मामलों में सर्जरी की जरूरत को टाल सकती है।
इस प्रक्रिया में कैथेटर के जरिए घुटने की सूजन वाली रक्त वाहिकाओं में छोटे-छोटे कण (माइक्रो-बीट्स) डालकर रक्त प्रवाह कम किया जाता है। इससे दर्द और सूजन में तेजी से और लंबे समय तक राहत मिलती है।
कई मरीजों को मिला इससे आराम
अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो एंशुट्ज स्कूल ऑफ मेडिसिन के चिकित्सकों द्वारा साझा किए गए अनुभव और शोध निष्कर्षों के अनुसार, इस तकनीक से कई मरीजों को लंबे समय तक लाभ मिला है। 74 वर्षीय सिंथिया श्राफ-फ्लेचर उन मरीजों में शामिल हैं जिन्हें इस प्रक्रिया से उल्लेखनीय लाभ मिला। उनके एक घुटने का पहले प्रत्यारोपण हो चुका था और उस सर्जरी के बाद उन्हें कुछ जटिलताओं का सामना करना पड़ा था। ऐसे में दूसरे घुटने के लिए उन्होंने जीएई का विकल्प चुना। करीब एक वर्ष बाद उनका कहना है कि उन्हें मिलने वाली राहत की तुलना घुटना प्रत्यारोपण से की जा सकती है। अब वे बागवानी और साइकिल चलाने जैसी गतिविधियां कर पा रही हैं।
किन मरीजों को होता है सबसे ज्यादा फायदा?
इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट और शोधकर्ता डॉ. ली कैसाडाबन के अनुसार, हल्के से मध्यम स्तर के ऑस्टियोअर्थराइटिस वाले मरीजों में सबसे अच्छे परिणाम देखने को मिले हैं। हालांकि गंभीर अवस्था वाले मरीज भी यह प्रक्रिया करा सकते हैं, लेकिन उनमें लाभ की अवधि अपेक्षाकृत कम हो सकती है। लगभग 70 प्रतिशत मरीजों में बहुत अच्छे परिणाम देखे गए हैं। कई मरीजों के दर्द के स्तर में आधे से भी अधिक कमी आई, जबकि कुछ मामलों में दर्द लगभग पूरी तरह समाप्त हो गया।
यह तकनीक उन लोगों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है जो लंबे समय से घुटने के दर्द से परेशान हैं और बिना सर्जरी के राहत पाना चाहते हैं। हालांकि, किसी भी चिकित्सा प्रक्रिया को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करना आवश्यक है।
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