ईरान-अमेरिका संघर्ष: तेल संकट के बाद अब दवाओं का संकट, कैंसर मरीजों की बढ़ी मुश्किलें
पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव अब सिर्फ ऊर्जा संसाधनों तक सीमित नहीं रह गया है। इसका गंभीर प्रभाव वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं और दवा आपूर्ति पर भी पड़ने लगा है। जहां पहले पेट्रोल, डीजल और गैस की बढ़ती कीमतों ने आम जनता को परेशान किया था, वहीं अब यह संकट अस्पतालों और मरीजों की जेब तक पहुंच चुका है। कैंसर, हृदय रोग और मधुमेह जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में उपयोग होने वाली दवाओं की कीमतों में तेजी से इजाफा हो रहा है, जबकि कई जीवनरक्षक दवाओं का उत्पादन भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
फार्मास्यूटिकल उद्योग की निर्भरता वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर होती है। दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सक्रिय दवा घटक (एपीआई), पैकेजिंग सामग्री और परिवहन सेवाएं सीधे अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं, माल ढुलाई की लागत आसमान छू रही है और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने उत्पादन लागत को काफी बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह स्थिति लंबी खिंचती है, तो कैंसर, हृदय रोग और गंभीर संक्रमणों की दवाएं और अधिक महंगी हो सकती हैं, जिससे लंबे इलाज पर निर्भर लाखों मरीजों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ेगा।
कैंसर की दवाओं की बढ़ती कीमतें
भारत का दवा उद्योग भी इस संघर्ष की चपेट में आ गया है। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख दवाओं जैसे सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन के साथ-साथ टिटनेस के इलाज में उपयोग होने वाले इम्युनोग्लोबुलिन इंजेक्शनों की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण दवा निर्माण में आवश्यक सक्रिय दवा घटकों (एपीआई) की वैश्विक कमी को माना जा रहा है।
दवा कंपनियों ने सरकार को कुल 82 दवाओं की कीमत बढ़ाने के लिए आवेदन दिए थे, हालांकि समीक्षा समिति ने फिलहाल केवल 4 दवाओं के मूल्य बढ़ाने की सिफारिश की है। कंपनियों का तर्क है कि एपीआई की कीमतों में भारी उछाल, बढ़ती उत्पादन लागत और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों में उतार-चढ़ाव के कारण मौजूदा कीमतों पर दवाओं का उत्पादन और बिक्री घाटे का सौदा बन गया है। कुछ कंपनियों ने तो यहां तक कहा है कि वे लगातार हो रहे नुकसान के कारण कई दवाओं का उत्पादन बंद करने पर मजबूर हो सकती हैं।
कीमोथेरेपी दवाओं की कमी से बढ़ा संकट
इस संकट का सबसे बुरा असर कैंसर मरीजों पर पड़ रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, कीमोथेरेपी में उपयोग होने वाली कई दवाएं बाजार से गायब होने लगी हैं। प्लैटिनम की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी के बाद दवा कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ा, जिसके चलते उन्होंने उत्पादन घटा दिया या दवाओं का स्टॉक रोकना शुरू कर दिया। यह स्थिति कैंसर रोगियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कीमोथेरेपी दवाओं की कमी से इलाज में देरी हो रही है, जो मरीजों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। ये दवाएं विशेष रूप से सिर और गर्दन, फेफड़े, ओवेरियन, ब्लैडर और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर जैसे गंभीर रोगों के उपचार में अहम भूमिका निभाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि आपूर्ति में इन रुकावटों के कारण डॉक्टरों को कम प्रभावी वैकल्पिक उपचारों का सहारा लेना पड़ सकता है। कुछ मामलों में, जहां सर्जरी संभव है, वहां नियोएडजुवेंट कीमोथेरेपी को रोकना पड़ सकता है, जिससे मरीजों के जल्दी ठीक होने की संभावना कम हो जाती है।
इस समस्या से निपटने के लिए विशेषज्ञ घरेलू उत्पादन बढ़ाने, राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक भंडारण करने और आपूर्ति श्रृंखला की पारदर्शी निगरानी की मांग कर रहे हैं।
चिकित्सकों की चिंता
बेंगलुरु स्थित एक वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. मानसी खंडेरिया के अनुसार, ये दवाएं कई प्रकार के कैंसर के उपचार के लिए बेहद जरूरी हैं। अगर दवाएं समय पर उपलब्ध नहीं हुईं, तो इलाज की समय-सीमा, उपचार के परिणाम और मरीजों का विश्वास, तीनों ही प्रभावित हो सकते हैं।
फोर्टिस हॉस्पिटल, बेंगलुरु की मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. नीति रायजादा का कहना है कि सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण कीमोथेरेपी दवाओं में गिना जाता है। इनके विकल्प अक्सर मरीजों पर उतने प्रभावी या उपयुक्त नहीं होते। इससे इलाज में देरी के साथ-साथ मरीजों की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ने की आशंका है।
सर गंगाराम अस्पताल के मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. श्याम अग्रवाल ने बताया कि पिछले 2-3 सप्ताह से पूरे देश में इन दोनों दवाओं की भारी कमी बनी हुई है। अस्पतालों में सिस्प्लैटिन और कार्बोप्लैटिन लगभग न के बराबर उपलब्ध हैं। लगभग 60 से 70 प्रतिशत एडवांस कैंसर के मरीजों को इन दवाओं की आवश्यकता होती है। समय पर दवाएं न मिल पाना रोग की गंभीरता और खतरे को काफी बढ़ा सकता है।