संवाद 2026: स्वामी चिदानंद सरस्वती का संदेश- संवाद से ही दूरियां मिटती हैं, रिश्ते जुड़ते हैं

लखनऊ में आयोजित ‘संवाद उत्तर प्रदेश 2026’ कार्यक्रम में अध्यात्म जगत की विशिष्ट हस्तियों ने भाग लिया। इस आयोजन में परमार्थ निकेतन आश्रम के अध्यक्ष और विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु स्वामी चिदानंद सरस्वती तथा ‘डिवाइन शक्ति फाउंडेशन’ की अध्यक्ष साध्वी भगवती सरस्वती ने अपने विचार रखे। दोनों ने जीवन, अनुशासन और खुशी जैसे विषयों पर गहन चर्चा की।

संवाद ही समाधान है

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने ‘मंगलम भगवान विष्णु मंगलम गरुड़ ध्वजा’ मंत्र के साथ संवाद की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि संपूर्ण जीवन दैवीय आज्ञा के अनुसार चलता है। प्रभु ने हमें चुन लिया है और सभी को अपनी-अपनी भूमिका निभानी है। परमार्थ का अर्थ ही दूसरों के लिए जीना है। उन्होंने बताया कि बचपन से मौन और ध्यान की साधना की, फिर हिमालय गए। आज पूरे विश्व को जिस समाधान की आवश्यकता है, वह हिमालय की शांति ने दिया।

उन्होंने कहा कि व्यस्त रहते हुए मस्त और स्वस्थ रहने का मंत्र जीवन के प्रभाव से मिलता है। संवाद का जीवन में क्या प्रभाव होता है, इसके सूत्र भी हिमालय से मिले। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त की कि इस कार्यक्रम का नाम ‘संवाद’ रखा गया है। संवाद ही समाधान है। संवाद से सभी दीवारें गिरती हैं, सारी दरारें भरती हैं और दिल से दिल जुड़ते हैं, चाहे वह राष्ट्र में हो, समाज में हो या संस्थान में। आज संकट का एक ही कारण है- संवाद का अभाव। उन्होंने संवाद को डायलिसिस की तरह बताया, जो शुद्धिकरण का काम करता है।

अनुशासन, आकांक्षाएं और संकल्प

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने अनुशासन को ‘निज पर शासन’ बताया। उन्होंने कहा कि सारी समस्याएं खुद से खड़ी होती हैं। यदि सोच छोटी हो, तो समाधान ही समस्या बन जाता है। उन्होंने कहा कि छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता। पहला अनुशासन सोच का अनुशासन है और दूसरा जिह्वा पर नियंत्रण का। सोच ही निर्धारित करती है कि हमें क्या करना है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार किसी संस्थान के संस्थापकों ने पहले अपनी सोच को अनुशासन में लाया, फिर तन्मय होकर काम में लग गए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपना सौ फीसदी देना चाहिए। सोच ही भाग्य का परिणाम है। उन्होंने कहा कि जहां-जहां सोच को नियंत्रित नहीं किया गया, वहां-वहां गिरावट आई। सनातन संस्कृति संवाद की संस्कृति है। गर्जना करने वाले गजनी गिरते गए, लेकिन सोमनाथ आज भी खड़ा है। जिह्वा नियंत्रण का जहां-जहां अभाव है, वहां-वहां समस्या है।

खुशी का असली अर्थ

साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि जीवन में सब कुछ इकट्ठा करने के बाद भी लोगों को रात को नींद नहीं आती। अकेलापन बढ़ता जा रहा है। सनातन संस्कृति कहती है कि जीवन में हर समस्या का समाधान है। इस संस्कृति ने हमें जीवन और जीवन जीने का ढंग दिया।

उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि अमेरिका में बाहर से देखने पर सब कुछ था, लेकिन भीतर की शांति और प्रसन्नता किसी के पास नहीं थी। जब वह छोटी आयु में ऋषिकेश आईं, तो देखा कि गंगा के किनारे किसी से भी पूछो कि आप कैसे हैं, तो सब कहते हैं- भगवान की कृपा है, मां गंगा की कृपा है। अमेरिका में जिनके पास सब कुछ है, वे शिकायतें करते रहते हैं, जबकि भारत की जमीन पर जिनके पास बहुत कम है, वे भी कहते हैं कि भगवान की कृपा है।

उन्होंने कहा कि अमेरिका में लोगों के लिए जीवन का प्रश्न है- ‘मेरे लिए क्या?’ इस सवाल का जवाब ढूंढते-ढूंढते वे कहीं भी प्रसन्नता हासिल नहीं कर पाते। सनातन संस्कृति सिखाती है कि खुशी बाहर नहीं, बल्कि भीतर है।

  • संवाद से दीवारें गिरती हैं और दरारें भरती हैं।
  • अनुशासन का अर्थ है खुद पर शासन करना।
  • सोच का अनुशासन ही सफलता की कुंजी है।
  • खुशी बाहरी वस्तुओं में नहीं, आंतरिक शांति में है।
  • सनातन संस्कृति संवाद और समाधान की संस्कृति है।