एक एआई फीचर ने रातों-रात बेकार कर दिया चमकता स्टार्टअप
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में बड़ी कंपनियों द्वारा लाए गए नए फीचर छोटे उद्यमों के लिए कितने घातक साबित हो सकते हैं, इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है। सैन फ्रांसिस्को स्थित एक स्टार्टअप की संस्थापक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी पीड़ा साझा की, जो तेजी से वायरल हो गई। उन्होंने बताया कि कैसे एंथ्रोपिक के एक नए टूल ने उनके तेजी से बढ़ते कारोबार को एक ही झटके में पुराना कर दिया।
दो महीने में मिली थी शानदार सफलता
स्टार्टअप की संस्थापक इरा बोडनर ने बताया कि उनकी कंपनी एआई के जरिए ग्राहकों के विज्ञापनों को मैनेज और ऑटोमेट करने का काम करती थी। इस विचार को अमल में लाने के लिए उन्होंने कई महीनों की मेहनत की थी। उनकी सेवा को ग्राहकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली। सिर्फ दो महीनों के भीतर ही उनके सैकड़ों पेड ग्राहक बन गए थे। कंपनी की ग्रोथ रफ्तार पकड़ चुकी थी और ग्राहकों को बनाए रखने की दर (रिटेंशन रेट) लगभग 70 प्रतिशत थी।
सुबह तक बिजनेस हुआ बेकार
इरा ने आगे बताया कि उनकी सेवा ग्राहकों को इसलिए पसंद आ रही थी क्योंकि यह उनके घंटों के काम को मिनटों में निपटा रही थी। लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब एंथ्रोपिक के क्लाउड और एक अन्य एआई टूल मैनस ने मेटा ऐड्स के लिए अपने नए कनेक्टर लॉन्च कर दिए। इन नए कनेक्टर्स ने उनके पूरे बिजनेस मॉडल को रातों-रात अप्रचलित बना दिया। एक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि सुबह तक उनका स्टार्टअप खत्म हो चुका था।
फिलहाल सीमित हैं ये नए टूल
संस्थापक ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल क्लाउड सीधे विज्ञापन अकाउंट में बदलाव नहीं कर सकता और यह केवल डेटा एनालिसिस तक ही सीमित है। साथ ही, इसे अभी तक गूगल ऐड्स तक पहुंच भी नहीं मिली है। हालांकि, उनका मानना है कि आने वाले कुछ महीनों में ये सीमाएं भी खत्म हो जाएंगी। ऐसे में उनके अनुसार, इस क्षेत्र में अब कोई नया प्रोडक्ट बनाना बेकार महसूस हो रहा है। यह घटना साफ दिखाती है कि एआई की दुनिया में प्रतिस्पर्धा कितनी तेज है, जहां एक नया फीचर पूरी प्रोडक्ट कैटेगरी को ही चुनौती दे सकता है।
बड़ी आईटी कंपनियों पर भी पड़ा असर
यह पहली बार नहीं है जब एंथ्रोपिक के किसी टूल ने बाजार में हलचल मचाई हो। हाल ही में कंपनी ने ‘क्लाउड कोवर्क’ नाम से एक ओपन-सोर्स एआई असिस्टेंट लॉन्च किया था। इसके बाद अमेरिका और भारत की आईटी कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई थी। अकेले आईबीएम के शेयर 13 प्रतिशत तक टूट गए थे, जिससे निवेशकों के लाखों करोड़ रुपये डूब गए। बाजार इस झटके से उबर भी नहीं पाया था कि एंथ्रोपिक ने ‘क्लाउड कोड सिक्योरिटी’ नामक एक और टूल पेश कर दिया। यह टूल सॉफ्टवेयर और नेटवर्क को एआई-आधारित साइबर हमलों से बचाने के लिए बनाया गया है।
बदल रहा है पूरा बिजनेस मॉडल
ये दोनों टूल उन सेवाओं के लिए ऑटोमेशन प्रदान करते हैं, जिन पर अभी तक कंपनियां करोड़ों डॉलर खर्च करती हैं। इससे आईटी कंपनियों के पारंपरिक बिजनेस मॉडल के चरमराने का खतरा पैदा हो गया है। सीधे शब्दों में कहें तो जो काम आईटी कंपनियां करती हैं, वही काम ये नए एआई टूल बहुत कम खर्च में कर सकते हैं। इस वजह से निवेशकों में आईटी कंपनियों के भविष्य को लेकर गहरी चिंता है, जिसके चलते बाजार में लगातार उथल-पुथल का माहौल बना हुआ है।
क्या खत्म हो जाएगा आईटी कंपनियों का अस्तित्व?
यह सवाल जटिल है, लेकिन इसका जवाब सीधा नहीं है। एआई के कारण काम करने के तरीकों में तेजी से बदलाव आ रहा है। पारंपरिक तरीके अब पुराने पड़ते जा रहे हैं। ऐसे में कंपनियों को अपने अस्तित्व को बचाने के लिए नई तकनीकों को अपनाना ही होगा। यह सच है कि एआई के कारण कई तरह की नौकरियां खत्म होंगी, लेकिन साथ ही नई तकनीक के साथ नए अवसर और नौकरियां भी पैदा होंगी। कंपनियों को खुद को बदलते परिवेश के अनुकूल ढालना होगा।