डेथबॉट्स: मृत्यु के बाद भी जीवित रहने वाला डिजिटल अस्तित्व

कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने अब मानवीय स्मृतियों और पहचान को एक नया आयाम दिया है। ‘डेथबॉट्स’ या डिजिटल प्रतिरूप एक ऐसी तकनीक है, जिसमें किसी व्यक्ति की आवाज, तस्वीरों, वीडियो और उसकी सोच के आधार पर एक एआई अवतार तैयार किया जाता है। यह अवतार उस व्यक्ति के जीवन से विदा लेने के बाद भी उसके परिवार से संवाद कर सकता है। यह तकनीक कुछ लोगों के लिए भावनात्मक सहारा बन रही है, तो वहीं इसके साथ गंभीर कानूनी, नैतिक और मानसिक प्रश्न भी उठ रहे हैं।

क्या हैं डेथबॉट्स?

आज के समय में नवीन एआई तकनीक की सहायता से ऐसे ‘डिजिटल मानव’ बनाना संभव हो गया है, जो किसी व्यक्ति के निधन के बाद भी उसी प्रकार बातचीत कर सकते हैं। इन्हें ‘डेथबॉट्स’ नाम दिया गया है। यह एक प्रकार का कंप्यूटर प्रोग्राम है जो उस व्यक्ति की तरह ही आवाज निकाल सकता है, उसके जैसा दिख सकता है और उसी के अंदाज में संदेशों का उत्तर दे सकता है। इस प्रोग्राम को तैयार करने के लिए उस व्यक्ति की पुरानी तस्वीरों, वीडियो और आवाज का उपयोग किया जाता है।

अक्सर परिवार के सदस्य अपने किसी प्रियजन की याद में यह डिजिटल प्रतिरूप बनवाते हैं। हालांकि, अब ऐसी कंपनियां भी मौजूद हैं जहां आप अपने जीवनकाल में ही अपना खुद का ‘डिजिटल समकक्ष’ तैयार करवा सकते हैं, ताकि आपके जाने के बाद आपके परिजन आपसे बातें कर सकें।

यह तकनीक कैसे काम करती है?

किसी भी व्यक्ति का एआई आधारित ‘डिजिटल प्रतिरूप’ बनाना अब काफी सरल हो गया है। इसके लिए सबसे पहले ऐसी सेवा प्रदान करने वाली कंपनी के पास एक खाता बनाना होता है। वहां आपसे आपकी पसंद-नापसंद और आपके विचारों से जुड़े अनेक प्रश्न पूछे जाते हैं। इसके बाद आप अपनी आवाज में अपनी यादों और कहानियों को रिकॉर्ड करते हैं, और साथ ही अपनी तस्वीरें और वीडियो भी अपलोड कर देते हैं।

इन सभी चीजों का उपयोग करके एआई सॉफ्टवेयर आपकी एक सटीक डिजिटल प्रतिलिपि तैयार कर देता है। फिर आपके निधन के बाद, जब आपके परिजन कंपनी को इसकी सूचना देते हैं, तो वे आपके उस डिजिटल रूप से बिल्कुल वास्तविक व्यक्ति की तरह बातचीत कर सकते हैं। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि इसमें किसी की इच्छा के विरुद्ध उसे वापस नहीं लाया जा रहा, बल्कि आप स्वेच्छा से कंपनी को अपना डेटा प्रदान कर रहे हैं ताकि वह आपका यह डिजिटल रूप बना सके।

कानूनी पेचीदगियां और अधिकार

जैसे-जैसे यह तकनीक विकसित हो रही है, कई ऐसी कानूनी उलझनें सामने आ रही हैं जिनका फिलहाल कोई स्पष्ट समाधान नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि कानून आपकी आवाज या आपके व्यक्तित्व को आपकी ‘संपत्ति’ नहीं मानता। अर्थात, अपनी पहचान पर आपका वैसा अधिकार नहीं है जैसा किसी भूमि या भवन पर होता है।

इसके अलावा, जो तस्वीरें या आवाज आप स्वयं रिकॉर्ड करते हैं, उन पर तो आपका अधिकार है, लेकिन जो बातें एआई स्वयं बनाकर बोलेगा, उन पर कॉपीराइट प्राप्त करना कठिन है। ऐसा इसलिए है क्योंकि कानून की दृष्टि में उन्हें किसी मानव ने नहीं, बल्कि मशीन ने बनाया है। एक बड़ा भय यह भी है कि यदि वह कंपनी भविष्य में बंद हो जाती है या तकनीक बदल जाती है, तो आपके उस डिजिटल रूप का क्या होगा? क्या आपका वह ‘डिजिटल समकक्ष’ भी हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा? यदि ऐसा हुआ, तो आपके परिवार को एक बार फिर वही पीड़ा सहनी पड़ सकती है जो उन्होंने आपके जाने पर झेली थी।

नैतिक जोखिम और चुनौतियां

डिजिटल प्रतिरूप बनाने में केवल कानूनी ही नहीं, बल्कि अनेक सामाजिक और मानसिक खतरे भी शामिल हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि एआई पूरी तरह से कंप्यूटर प्रोग्राम पर निर्भर करता है, इसलिए समय के साथ संभव है कि वह ऐसी बातें करने लगे जो आपकी वास्तविक सोच या स्वभाव से बिल्कुल भिन्न हों।

इसके अलावा, एक भय यह भी है कि परिजन आपकी यादों से बाहर निकलने के बजाय उस एआई के इतने अभ्यस्त हो जाएं कि वे कभी सामान्य जीवन में वापस न लौट पाएं। साथ ही, यदि कल को वह एआई ऐसी कोई बात कह देता है जिससे परिवार को दुख पहुंचे या कोई विवाद उत्पन्न हो जाए, तो इसकी जिम्मेदारी किस पर होगी? यह प्रश्न भी अभी तक अनुत्तरित है।

  • भावनात्मक निर्भरता: लोग वास्तविकता से दूर होकर डिजिटल अवतार पर निर्भर हो सकते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।
  • डेटा सुरक्षा: व्यक्तिगत डेटा, जैसे आवाज और तस्वीरें, हैकिंग या दुरुपयोग के जोखिम में हो सकते हैं।
  • पहचान की चोरी: किसी मृत व्यक्ति के डिजिटल अवतार का उपयोग धोखाधड़ी या गलत उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
  • सहमति का मुद्दा: यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में इस तकनीक के लिए सहमति नहीं देता, तो उसके परिजनों द्वारा ऐसा करना नैतिक रूप से गलत माना जा सकता है।

यह तकनीक जहां एक ओर शोक संतप्त परिवारों को सांत्वना देने का वादा करती है, वहीं दूसरी ओर यह मानवीय संबंधों, गोपनीयता और पहचान की परिभाषा पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। इस दिशा में स्पष्ट कानूनी ढांचा और नैतिक दिशा-निर्देश विकसित करना आवश्यक हो गया है।