बुध प्रदोष व्रत: जानें शुभ मुहूर्त, व्रत कथा और शिव आरती
हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। वर्तमान में वैशाख मास चल रहा है, और इस महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी बुधवार के दिन पड़ रही है। इस दिन का व्रत ‘बुध प्रदोष व्रत’ कहलाता है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है। संध्या काल में पूजा करने के बाद व्रत कथा का पाठ करना या सुनना अत्यंत आवश्यक माना गया है, तभी यह व्रत पूर्ण फलदायी होता है।
बुध प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त
द्रिक पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण त्रयोदशी तिथि 15 अप्रैल को रात 12:12 बजे प्रारंभ होकर उसी दिन रात 10:31 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि और प्रदोष काल को ध्यान में रखते हुए यह व्रत 15 अप्रैल को ही रखा जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ समय शाम 6:47 बजे से रात 9:00 बजे तक रहेगा।
बुध प्रदोष व्रत कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक व्यक्ति का विवाह हाल ही में हुआ था। शादी के दो दिन बाद उसकी पत्नी अपने मायके चली गई। कुछ समय बाद वह उसे वापस लाने पहुंचा। जब वह बुधवार के दिन पत्नी को लेकर लौटने लगा, तो ससुराल वालों ने उसे समझाया कि बुधवार को विदाई करना शुभ नहीं माना जाता। लेकिन उसने उनकी बात अनदेखी कर दी और पत्नी को साथ लेकर चल पड़ा।
रास्ते में नगर के बाहर उसकी पत्नी को प्यास लगी। वह पानी लेने चला गया और पत्नी को एक पेड़ के नीचे बैठा दिया। जब वह पानी लेकर लौटा, तो उसने देखा कि उसकी पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ हंसकर बातें कर रही है और उसी के लोटे से पानी पी रही है। यह देखकर वह क्रोधित हो गया।
जब वह पास पहुंचा, तो वह चौंक गया क्योंकि उस व्यक्ति का चेहरा बिल्कुल उसी जैसा था। पत्नी भी असमंजस में पड़ गई। दोनों के बीच विवाद होने लगा और आसपास लोग इकट्ठा हो गए। सिपाही भी वहां पहुंच गए और असली पति की पहचान करने को कहा। पत्नी भ्रमित हो गई और कुछ समझ नहीं पाई।
तब उस व्यक्ति ने भगवान शिव से प्रार्थना की और अपनी गलती स्वीकार करते हुए क्षमा मांगी कि उसने बड़ों की सलाह को नजरअंदाज किया। उसकी सच्ची प्रार्थना के बाद वह हमशक्ल व्यक्ति अचानक गायब हो गया। इसके बाद पति-पत्नी सुरक्षित अपने घर लौट आए। इस घटना के बाद दोनों ने नियमपूर्वक बुध प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा से करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
शिवजी की आरती: ॐ जय शिव ओंकारा
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।
सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूरे का भोजन, भस्मी में वासा॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥
ओम जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥
ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥
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