शीतला अष्टमी: क्यों चढ़ाया जाता है बासी भोजन और लगाए जाते हैं हल्दी के छापे?
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से माता शीतला की आराधना के लिए समर्पित है। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। प्राचीन काल से यह विश्वास रहा है कि माता की कृपा से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और विशेषकर बच्चों को विभिन्न रोगों से सुरक्षा मिलती है।
इस पर्व की सबसे विशेष परंपरा यह है कि इस दिन माता को बासी या ठंडा भोजन का भोग लगाया जाता है और हल्दी मिले जल का विशेष प्रयोग किया जाता है। इन दोनों परंपराओं के पीछे गहरी धार्मिक आस्था और लोक विश्वास जुड़े हुए हैं। आइए, इन्हीं परंपराओं के बारे में विस्तार से जानते हैं।
बासी भोजन अर्पित करने की धार्मिक मान्यता
शीतला अष्टमी के दिन माता को ठंडा भोजन अर्पित करने की परंपरा को कई स्थानों पर ‘बसोड़ा’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शीतला माता को शीतलता अत्यंत प्रिय है। इसी कारण इस दिन गर्म भोजन नहीं बनाया जाता और माता को एक दिन पहले तैयार किया गया भोजन ही अर्पित किया जाता है।
लोक मान्यता के अनुसार, माता शीतला का स्वभाव शांत और शीतल माना गया है, इसलिए उनकी पूजा में भी शीतलता का विशेष महत्व बताया गया है। इसीलिए शीतला अष्टमी से एक दिन पहले घरों में पूड़ी, पुआ, कढ़ी, मीठे चावल और अन्य पकवान बनाकर रख लिए जाते हैं। अगले दिन इन्हीं ठंडे पकवानों का भोग माता को लगाया जाता है।
कहा जाता है कि श्रद्धा भाव से माता को ठंडा भोजन अर्पित करने से वे प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों के घर-परिवार को रोगों और कष्टों से दूर रखती हैं। यही कारण है कि शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा जलाने की परंपरा नहीं निभाई जाती।
हल्दी जल का महत्व
शीतला अष्टमी के अवसर पर हल्दी का भी विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन माता शीतला को हल्दी मिले हुए जल से स्नान कराया जाता है। हल्दी को पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है, इसलिए माता को हल्दी युक्त जल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है।
कई स्थानों पर यह परंपरा भी निभाई जाती है कि जिस जल से माता को स्नान कराया जाता है, उसी जल को घर में छिड़का जाता है। मान्यता है कि इससे घर का वातावरण शुद्ध और मंगलमय बना रहता है।
दरवाजों पर हल्दी के छाप लगाने की परंपरा
शीतला अष्टमी के दिन घर के मुख्य द्वार और दीवारों पर हल्दी के छाप या हाथ के निशान लगाने की भी परंपरा है। इसे माता शीतला के स्वागत और उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रतीक माना जाता है। लोक मान्यता के अनुसार, हल्दी का यह चिन्ह घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और माता की कृपा से घर-परिवार को रोगों और नकारात्मकता से रक्षा मिलती है।
कई स्थानों पर माता को स्नान कराने वाले हल्दी जल को बच्चों की आंखों पर भी लगाया जाता है और घर में छिड़का जाता है। माना जाता है कि इससे बच्चों की रक्षा होती है और माता का आशीर्वाद बना रहता है।