महिलाओं में ब्रेन ट्यूमर का बढ़ता खतरा: गर्भनिरोधक गोलियों का लंबे समय तक इस्तेमाल हो सकता है कारण

ब्रेन ट्यूमर का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के मन में कैंसर का डर बैठ जाता है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार हर ट्यूमर कैंसर नहीं होता, लेकिन फिर भी यह अपने आप में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है जो कई जटिलताओं को जन्म दे सकता है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में ब्रेन ट्यूमर के मामलों में चिंताजनक वृद्धि देखी गई है। हर साल लगभग 40,000 नए मरीज सामने आते हैं, जिनमें से करीब 25,000 लोग इस बीमारी से जान गंवा देते हैं। यह देश में 14वां सबसे आम कैंसर और कैंसर से होने वाली मौतों का 11वां सबसे बड़ा कारण बन चुका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आनुवंशिक कारणों के अलावा खराब जीवनशैली, बढ़ता तनाव, नींद की कमी और पर्यावरणीय प्रदूषण ने युवाओं में भी इस बीमारी का खतरा बढ़ा दिया है। इसी संदर्भ में एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने महिलाओं में एक आम आदत को ब्रेन ट्यूमर के बढ़ते जोखिम से जोड़ा है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि लंबे समय तक गर्भनिरोधक गोलियों, इंजेक्शन या अन्य हार्मोनल गर्भनिरोधकों का उपयोग करने वाली महिलाओं में मेनिन्जियोमा नामक ब्रेन ट्यूमर विकसित होने की संभावना अधिक हो सकती है।

गर्भनिरोधक गोलियां: सुरक्षित विकल्प या छिपा खतरा?

दुनिया भर में लाखों महिलाएं अनचाहे गर्भ से बचने के लिए गर्भनिरोधक गोलियों पर निर्भर रहती हैं। इन्हें लंबे समय से एक सुरक्षित और प्रभावी तरीका माना जाता रहा है। लेकिन डॉक्टर की सलाह के बिना इनका लगातार उपयोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। डेनमार्क में 30 लाख महिलाओं के 25 वर्षों के मेडिकल रिकॉर्ड पर किए गए एक बड़े अध्ययन ने इस खतरे को उजागर किया है। इस शोध में पाया गया कि कुछ विशेष प्रकार के हार्मोन-आधारित गर्भनिरोधकों का सेवन करने वाली महिलाओं में मेनिन्जियोमा का जोखिम सामान्य महिलाओं की तुलना में काफी अधिक होता है।

मेनिन्जियोमा एक प्रकार का ट्यूमर है जो सीधे मस्तिष्क के अंदर नहीं, बल्कि मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को ढकने वाली झिल्ली (मेनिंजेस) में विकसित होता है। यह ट्यूमर ज्यादातर मामलों में कैंसर नहीं होता, लेकिन इसके आकार में वृद्धि होने पर यह आसपास के ऊतकों पर दबाव डालने लगता है। इसके परिणामस्वरूप लगातार सिरदर्द, मिर्गी के दौरे, धुंधली दृष्टि और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। कई बार इसके इलाज के लिए सर्जरी या रेडियोथेरेपी की भी आवश्यकता पड़ जाती है।

अध्ययन में क्या निकला सामने?

शोधकर्ताओं ने 25 वर्षों तक इस संबंध को समझने के लिए गहन अध्ययन किया। उन्होंने 1,473 महिलाओं के डेटा का विश्लेषण किया, जिनमें मेनिन्जियोमा पाया गया था, और उनकी तुलना 14,717 स्वस्थ महिलाओं से की। अध्ययन में सबसे अधिक खतरा मेड्रॉक्सीप्रोजेस्टेरोन नामक हार्मोन वाले गर्भनिरोधक इंजेक्शन से जुड़ा पाया गया, जिसे ब्रिटेन में डेपो-प्रोवेरा के नाम से जाना जाता है।

  • इस इंजेक्शन का उपयोग करने वाली महिलाओं में मेनिन्जियोमा होने का जोखिम 355 प्रतिशत तक बढ़ गया था।
  • उम्र बढ़ने के साथ यह खतरा और अधिक बढ़ जाता है। 55 से 59 वर्ष की महिलाओं में, यदि वे एक वर्ष तक यह इंजेक्शन लेती हैं, तो हर 5,372 महिलाओं में से एक को अतिरिक्त रूप से मेनिन्जियोमा हो सकता है।
  • वहीं, 15 से 19 वर्ष की युवा महिलाओं में यह जोखिम बहुत कम था, जहां लगभग 4.49 लाख महिलाओं में से एक अतिरिक्त मामला सामने आने का अनुमान लगाया गया।

कौन सी गोलियां हैं सबसे खतरनाक?

जामा नेटवर्क जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में कुछ संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियों (जिनमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टोजेन दोनों हार्मोन होते हैं) से भी जोखिम बढ़ा हुआ पाया गया। शोधकर्ताओं ने विभिन्न प्रकार के प्रोजेस्टोजेन हार्मोन वाली गोलियों के जोखिम का विश्लेषण किया:

  • डेसोजेस्ट्रेल वाली दवाओं में खतरा 66% अधिक पाया गया।
  • साइप्रोटेरोन वाली दवाओं में 61% अधिक जोखिम देखा गया।
  • ड्रोस्पाइरेनोन वाली गोलियों में 58% अधिक खतरा था।
  • जेस्टोडीन वाली दवाओं में 44% अधिक जोखिम पाया गया।
  • लेवोनॉरजेस्ट्रेल वाली गोलियों में 40% अधिक खतरा था।
  • नोरेथिस्टेरोन वाली दवाओं में 38% अधिक जोखिम देखा गया।
  • नॉरजेस्टिमेट वाली गोलियों में सबसे कम 4% अधिक जोखिम पाया गया।

विशेषज्ञों की राय और सावधानियां

डेनिश मेडिसिन्स एजेंसी के वैज्ञानिकों का कहना है कि पहले यह माना जाता था कि यह खतरा केवल उच्च डोज वाली हार्मोनल दवाओं और डेपो इंजेक्शन तक सीमित है। लेकिन नए शोध से पता चलता है कि सामान्य गर्भनिरोधक गोलियों में इस्तेमाल होने वाले प्रोजेस्टोजेन हार्मोन भी इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं। हालांकि, राहत देने वाली बात यह है कि अधिकांश महिलाओं में गर्भनिरोधक का उपयोग बंद करने के पांच साल के भीतर यह बढ़ा हुआ खतरा लगभग समाप्त हो जाता है।

अमेरिकी कैंसर विशेषज्ञ पॉल फरो के अनुसार, यह एक ऑब्जर्वेशनल स्टडी है, जिसमें स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया है। इसलिए यह पूरी तरह से साबित नहीं किया जा सकता कि दवा ही इसका एकमात्र कारण है। फिर भी, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों को देखते हुए दोनों के बीच संबंध मजबूत दिखाई देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जोखिम केवल दवा लेने के दौरान ही देखा गया, और दवा बंद करने के बाद धीरे-धीरे कम हो गया।

आब्स्टट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर जीनो पेकोरारो का कहना है कि यह अध्ययन डॉक्टर और मरीज के बीच सही जानकारी के आधार पर निर्णय लेने में मदद करेगा। यदि कोई महिला इस खबर को लेकर चिंतित है, तो वह अपने डॉक्टर से परामर्श करके गर्भनिरोधक के अन्य विकल्पों पर विचार कर सकती है।