नवजात और शिशु स्वास्थ्य: सरकार का नया कार्यक्रम, तीन साल तक हर बच्चे की होगी निगरानी

अब नवजात और छोटे बच्चों की देखभाल सिर्फ टीकाकरण तक सीमित नहीं रहेगी। केंद्र सरकार ने एक नई पहल के तहत जन्म के बाद तीन साल यानी 36 महीने तक हर बच्चे की नियमित निगरानी का फैसला किया है। इस योजना के तहत, यदि कोई बच्चा कम वजन का है, समय से पहले पैदा हुआ है, या उसके शारीरिक और मानसिक विकास में कोई देरी दिखती है, तो उसे तुरंत उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा जाएगा और विशेष देखभाल प्रदान की जाएगी।

समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने हाल ही में ‘समग्र शिशु बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम’ का शुभारंभ किया। इस मौके पर उन्होंने माता-पिता को विशेष सलाह देते हुए कहा कि तीन साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल फोन, टैबलेट और अन्य स्क्रीन से दूर रखना चाहिए। उन्होंने बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए इस दिशा में ठोस कदम उठाने पर जोर दिया।

उच्च जोखिम वाले बच्चों की पहचान और देखभाल

नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, जो बच्चे स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में भर्ती रहे हैं, उन्हें भी उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा जाएगा। ऐसे बच्चों की बार-बार जांच की जाएगी और उन्हें विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास रेफर किया जाएगा। इसके अलावा, गाइडलाइन में नवजात और छोटे बच्चों में दिखने वाले कई खतरनाक संकेतों (डेंजर साइन) की सूची भी दी गई है। इनमें दूध न पीना, सांस लेने में तकलीफ, बार-बार दौरे पड़ना, तेज बुखार, लगातार दस्त, मल में खून, सुस्ती या बेहोशी और सीने का अधिक धंसना जैसे लक्षण शामिल हैं। ऐसे मामलों में बच्चे को तुरंत अस्पताल ले जाने की सलाह दी गई है।

आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका और परिवारों को सलाह

इस कार्यक्रम में आशा कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका होगी। वे नियमित रूप से घर-घर जाकर माताओं और परिवारों को निम्नलिखित बातों के बारे में जागरूक करेंगी:

  • केवल मां का दूध पिलाना क्यों आवश्यक है और इसके फायदे।
  • त्वचा से त्वचा का संपर्क (कंगारू मदर केयर) कितना लाभदायक है।
  • बच्चे से बात करना, खेलना और भावनात्मक जुड़ाव क्यों जरूरी है।
  • घर के वातावरण को साफ और सुरक्षित कैसे रखा जाए।
  • छह सप्ताह के बाद उम्र के अनुसार पोषण, खेल और मानसिक विकास को कैसे बढ़ावा दिया जाए।

जलवायु परिवर्तन और बच्चों का स्वास्थ्य

पहली बार, नई गाइडलाइन में जलवायु परिवर्तन को बच्चों के स्वास्थ्य से जोड़ा गया है। आशा कार्यकर्ता परिवारों को तेज गर्मी और वायु प्रदूषण से बच्चों को बचाने के उपाय बताएंगी। इनमें शामिल है:

  • दोपहर की तेज धूप में बच्चे को बाहर न ले जाना।
  • हल्के और सूती कपड़े पहनाना।
  • नवजात को बार-बार स्तनपान कराना।
  • प्रदूषित हवा से बचाव के तरीके अपनाना।

डिजिटल निगरानी और ट्रैकिंग

इस योजना को डिजिटल प्लेटफॉर्म से भी जोड़ा गया है। हर नवजात की जानकारी जननी पोर्टल और शैशव एप में दर्ज की जाएगी। जोखिम वाले बच्चों को डिजिटल रूप से चिह्नित किया जाएगा, ताकि आशा, एएनएम, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और डॉक्टर मिलकर उनकी नियमित निगरानी कर सकें। सरकार का यह कदम बच्चों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने और शिशु मृत्यु दर को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।