आषाढ़ माह का आरंभ: देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत, जानिए धार्मिक मान्यताएं

हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास की शुरुआत 30 जून से हो गई है, जो 29 जुलाई तक चलेगा। यह हिंदू कैलेंडर का चौथा महीना है, जिसके बाद सावन का पवित्र महीना आरंभ होता है। इस महीने का धार्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व है, क्योंकि इसमें देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत होती है, जो चार महीने तक चलता है। आषाढ़ माह में भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना का विधान है, क्योंकि इसी माह की एकादशी तिथि पर वे योग निद्रा में चले जाते हैं।

आषाढ़ माह का धार्मिक महत्व

शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ का महीना भक्ति, साधना, तप और ध्यान के लिए समर्पित होता है। इसी महीने से वर्षा ऋतु का आगमन होता है, जो प्रकृति में नवजीवन और हरियाली का संचार करती है। आषाढ़ मास में भगवान विष्णु की उपासना का विशेष विधान है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी के दिन सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीर सागर में चार महीने के लिए योग निद्रा में विश्राम करने चले जाते हैं। इस दौरान सभी प्रकार के शुभ और मांगलिक कार्य स्थगित हो जाते हैं। साधु-संन्यासी भी इस समय एक स्थान पर रहकर चातुर्मास का पालन करते हैं और यात्रा करना वर्जित माना जाता है।

देवशयनी एकादशी और चातुर्मास

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष यह तिथि 25 जुलाई को पड़ रही है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस दिन भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ होता है, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक चलेगा। देवउठनी एकादशी इस वर्ष 21 नवंबर को मनाई जाएगी, जब भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा के बाद जागृत होंगे। देवशयनी एकादशी के दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की पूजा करने का विशेष महत्व है। चातुर्मास के इन चार महीनों में विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त नहीं रहते। यह समय व्रत, सत्संग, कथा और सेवा कार्यों के लिए सर्वोत्तम माना जाता है।

गुरु पूर्णिमा का पर्व

आषाढ़ माह में ही गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व मनाया जाता है, जिसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने वेदों, महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण जैसे महान ग्रंथों की रचना की। इस दिन गुरुओं की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

आषाढ़ माह में करने योग्य शुभ कार्य

  • इस माह भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और भगवान शिव की विशेष पूजा करने का विधान है।
  • प्रतिदिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना लाभकारी माना गया है।
  • सुबह और शाम तुलसी के पौधे की पूजा करें और उसके समीप दीपक जलाएं।
  • श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णु सहस्त्रनाम और रामचरितमानस का पाठ करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
  • आषाढ़ मास में दान-पुण्य का विशेष महत्व है, इसलिए जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र आदि का दान करें।

आषाढ़ माह में वर्जित कार्य

चूंकि इस माह से चातुर्मास की शुरुआत होती है, इसलिए इस दौरान कुछ कार्यों को वर्जित माना गया है। चातुर्मास में विवाह, सगाई, गृहप्रवेश, मुंडन संस्कार और अन्य मांगलिक आयोजन नहीं किए जाते। साथ ही, साधु-संन्यासियों के लिए एक स्थान पर रहकर साधना करना और यात्रा न करना आवश्यक होता है। यह समय आत्मचिंतन और आध्यात्मिक उन्नति का होता है।

आषाढ़ माह धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण है। यह महीना भक्ति, साधना और दान-पुण्य के लिए समर्पित रहता है। इस माह में किए गए धार्मिक अनुष्ठान और व्रत-उपवास अक्षय फल प्रदान करने वाले माने जाते हैं।